Monday , 22 July 2019
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बोद्ध धर्म और जैन धर्म में समानताएं

समानताएं ( Points of Agreement )

इतिहास साक्षी है कि इन दोनों धर्मों का जन्म एक ही समय और समान परिस्थितियों में हुआ है । ये दोनों धर्म वास्तव में छठी सदी ईस्वी पूर्व में हिन्दू धर्म की बुराइयों और दोषों के कारण पैदा हुए हैं । इन धर्मों के साथ जन – साधारण के धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ । हिन्दू धर्म तो केवल ब्राह्मणों का धर्म होकर रह गया था । इसके बिना इस प्रकार के धर्म की आवश्यकता भी अनुभव की जा रही थी जो बहुत सरल हो और बहुत खर्चीला न हो । इन आवश्यकताओं की पूति के लिए जैन और बौद्ध धर्म प्रकाश में आए क्योंकि इन दोनों धर्मों का एक ही लक्ष्य था कि हिन्दू धर्म की बुराइयों को दूर करना । इसलिए इन में समानता होना स्वाभाविक ही था । बोद्ध धर्म और जैन धर्म में समानताएं इस प्रकार है –

दोनों सुधारवादी धर्म ( Botli Reform Movements )

दोनों धर्मों का मुख्य उद्देश्य हिन्दू धर्म में सुधार था । दोनों धर्मों के संस्थापक किसी विशिष्ट धर्म की स्थापना करना नहीं चाहते थे । उनके हृदयों में आडम्बर प्रिय ब्राह्मण – वर्ग के प्रति रोष था , जिस की प्रतिक्रिया ही जैन और बौद्ध धर्मों के रूप में प्रकट हुई ।

अहिंसा ( Ahimsa )

दोनों धर्म अहिंसा में विश्वास रखते थे । अहिंसा दोनों धर्मों का मुख्य सिद्धांत कहा जा सकता है ।

जाति – पाति का विरोध ( Opposition to Caste System ) – बोद्ध धर्म और जैन धर्म में समानताएं

दोनों धर्म जाति – पाति और ऊंच – नीच के भावों को बुरा समझते थे । ये मनुष्य मात्र को एक समान ही समझते थे ।

ब्राह्मणों की प्रधानता के विरुद्ध ( Against the dominance of Brahmans )

दोनों धर्म ब्राह्मणों की प्रधानता को बुरा समझते थे । तात्पर्य यह कि दोनों धर्मों में ब्राह्मणों को कोई विशेष स्थान प्राप्त नहीं था ।

बोद्ध धर्म और जैन धर्म में असमानताएं

वेदों और संस्कृत के विरोधी ( Against the Vedas and Sanskrit )

दोनों धर्म वेदों को कोई विशेष महत्त्व नहीं देते और न ही अपने धर्म के प्रचार के लिए संस्कृत को विशेष साधन मानते थे ।

ईश्वर में अविश्वास ( Non Faith in God )

दोनों धर्म ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते । जैन मत तो स्पष्ट शब्दों में ईश्वर की शक्ति को अस्वीकार करता है । बौद्ध धर्म इस विषय में सर्वथा मौन है ।

यज्ञ और बलियों के विरुद्ध ( Against Yajnas and Sacrifices )

दोनों धर्म यज्ञों के पक्ष में नहीं हैं । इन धर्मों में बलि देने की प्रथा का भी विरोध किया गया है ।

सहनशीलता में विश्वास ( Faith in Toleration )

दोनों धर्म पूर्णतया सहनशीलता में विश्वास रखते हैं । किसी अन्य धर्म को यह बुरा – भला कहने के पक्ष में नहीं हैं ।

दोनों धर्मों के संस्थापक क्षत्रिय राजकुमार थे ( Both started by Kshatriya Princes )

दोनों धर्मों के संस्थापक क्षत्रिय राजकुमार ही थे । महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी दोनों ही क्षत्रिय थे , जिन्होंने उपनिषदों की शिक्षाओं से ही उत्साह लिया था । दोनों ने जनता की बोलचाल की भाषा पाली में शिक्षा दी ।

कर्म और मुक्ति ( Karma and Nirvana )

दोनों धर्म ही कर्म पर बल देते हैं । जैसा कोई कर्म करेगा , वैसा उसे फल मिलेगा । मनुष्य के जीवन का उद्देश्य मुक्ति प्राप्त करना है और दोनों धर्म उसे मानते हैं ।

सदाचार पर विशेष बल ( Emphasis on Morality ) – बोद्ध धर्म और जैन धर्म में समानताएं

दोनों धर्मों ने झूठे रीति – रिवाज़ के स्थान पर सदाचार और पवित्र जीवन पर बल दिया ।

दोनों प्रजातांत्रिक संघों में संगठित थे ( Both had democratic Organizations )

जहां इन धर्मों ने अपने लिए कई मठ बनवाए थे , वहां इन मठों का कार्यक्रम प्रजातान्त्रिक ढंग से चलता था । इन मठों के भिक्षुओं के ऊंचे और सच्चे आचरण के कारण इन धर्मों का विकास हुआ था ।

दोनों का ही देवी – देवताओं पर अविश्वास ( Both had no faith in Gods and Godesses )

जैन धर्म और बौद्ध धर्म दोनों ही देवी – देवताओं पर कोई विश्वास नहीं रखते थे । उनका विचार था कि देवी या देवताओं की पूजा के साथ कोई अपने कर्म के फल भोगने से नहीं बच सकता था और न ही पूजा – पाठ मनुष्य को सांसारिक बन्धनों से मुक्त करवा सकता था । सच्चे कर्म और सदाचार के साथ ही व्यक्ति मुक्ति प्राप्त कर सकता था ।

दोनों को दो मुख्य सम्प्रदायों में विभाजन ( Both divided into two main Branches )

दोनों धर्मों का दो मुख्य सम्प्रदायों में विभाजन हो गया । जैन धर्म के दो मुख्य सम्प्रदाय थे ( 1 ) श्वेताम्बर , ( ii ) दिगम्बर । इस प्रकार बौद्ध धर्म के मुख्य दो सम्प्रदाय थे — ( i ) हीनयान ( ii ) महायान ।

दोनों के ही तीन रत्न और तीन धार्मिक ग्रंथ ( Both had three Jewels | and three religious Books )

इन दोनों धर्मो ( बौद्ध और जैन ) के तीन – तीन रत्न थे । बौद्ध धर्म के तीन रत्न बुद्ध , धर्म और संघ हैं और जैन धर्म के तीन रत्न दर्शन , ज्ञान और चरित्र हैं । इस प्रकार बौद्ध धर्म के तीन ग्रंथ सुतपिटक , विनयपिटक , अभिधम पिटक और जैन धर्म के तीन ग्रंथ हैं अंग , उप – अंग और मूल ।

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