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समुद्रगुप्त और उसकी राजनीतिक दशा

प्रारम्भिक जीवन ( Early Life of Samudragupta )

समुद्र गुप्त चन्द्रगुप्त प्रथम का पुत्र था । इसकी माता लिच्छवि वंश की राजकुमारी कुमार देवी थी । इसका समुद्र गुप्त पर बहुत प्रभाव था । वह बड़े गर्व से स्वयं को “ लिच्छवि दोहता “ कहता था । समुद्रगुप्त के बाल्य काल के विषय में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है । इतना अवश्य पता चलता है कि समुद्रगुप्त अपने पिता के साथ लड़ाइयों में जाया करता था जिसके कारण वह युद्ध कला में अतीव निपुण और निर्भय हो गया था , इसलिए उसके पिता ने अपने बहुत से पुत्रों में से इसे सिंहासन का उत्तराधिकारी चुना था । 335 ई० में अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् समुद्रगुप्त सिंहासन पर बैठा । सिंहासन प्राप्ति के लिए सम्भवतः उसे अपने सम्बन्धियों से लड़ाई करनी पड़ी थी , जिसमें विजय ने उसके कदम चूमे ।

गुप्तकालीन कला और साहित्य

राजनीतिक दशा ( Political Condition at the time of Samudragupta )

जिस समय समुद्रगुप्त सिंहासन पर बैठा उस समय भारत की राजनीतिक अवस्था बहुत शोचनीय थी । चारों ओर अशान्ति तथा अराजकता का बोल बाला था । देश का विभाजन अनेक छोटे – छोटे भागों में हो चुका था । इसलिए समुद्रगुप्त के सामने सबसे प्रमुख समस्या इनकी यह थी कि किस प्रकार इन असंख्य छोटे – छोटे राज्यों को एकता के सूत्र में बांधा जाए । यह कोई साधारण काम नहीं था , परन्तु उस वीर , शक्तिशाली और दूरदर्शी सम्राट् समुद्रगुप्त ने अपने बाहुबल से ही अपने छोटे से राज्य को एक विशाल साम्राज्य बना दिया ।

वी. ए. स्मिथ ( V . A . Smith ) ने लिखा है । कि “ गुप्त वंश का दूसरा सम्राट् समुद्रगुप्त जिसने भारत पर लगभग 40 – 50 वर्ष राज्य किया , भारतीय इतिहास में सबसे अधिक उल्लेखनीय और सुयोग्य शासक था । “

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