Tuesday , 16 July 2019
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मौर्य साम्राज्य की जानकारी के मुख्य स्त्रोत

मौर्य साम्राज्य की जानकारी के मुख्य स्त्रोत

मौर्य वंश के पूर्व इतिहास की जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारे समक्ष केवल धार्मिक ग्रंथ ही हैं तथा इन पर ही हमें निर्भर करना होगा , परन्तु मौर्य वंश के इतिहास के लिए हमारे समक्ष इन धार्मिक ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य ऐतिहासिक स्रोत भी हैं । इनमें ऐतिहासिक पुस्तके तथा शिलालेख अादि महत्त्वपूर्ण हैं । इससे हमें मौर्यकाल के राज्य – प्रबन्ध , राजनीतिक , धार्मिक तथा सामाजिक अवस्था के बारे में ज्ञान प्राप्त होता । है । दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि मौर्य इतिहास के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए इतिहासकारों के पास पर्याप्त सामग्री है । इसलिए डॉ० वी० ए० स्मिथ ( V . A . Smith ) ने लिखा है , ” मौर्य वंश के प्रारम्भ के साथ ही इतिहासकार अन्धकार से प्रकाश में आ जाते हैं । “ इस काल का ऐतिहासिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित स्रोत मुख्य हैं :-

मेगस्थनीज की पुस्तक इंडिका

मौर्य वंश के विषय में सर्वप्रथम हमें मैगस्थनीज की पुस्तिका ‘ इण्डिका ‘ से ज्ञान प्राप्त होता है । मैगस्थनीज़ सिकन्दर के उत्तराधिकारी सैल्यूकस निकेटोर ( Seleukus Necator ) की ओर से चन्द्रगुप्त के दरबार में एक राजदूत के रूप में आया था । यह माना जाता है कि वह चन्द्रगुप्त की राजधानी पाटलीपुत्र में कोई पांच वर्ष ( 302 …

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र

अर्थशास्त्र के लेखक चाणक्य हैं । यह पुस्तक मौर्य काल के इतिहास के लिए दूसरा स्रोत है । चाणक्य को विष्णु गुप्त भी कहा जाता है । कौटिल्य तो उसे उसकी पुस्तक ‘ अर्थशास्त्र ‘ के कारण कहा जाता है क्योंकि इस पुस्तक में राजाओं के लिए कुटिल नीति पर बहुत से उत्तम सिद्धान्त दिए गए हैं । चाणक्य चन्द्रगुप्त का …

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विशाखदत्त का मुद्राराक्षस ( Mudra Rakshasa by Vishakha Datta )

मुद्राराक्षस एक अन्य प्रसिद्ध रचना है जो चन्द्रगुप्त मौर्य एवं उसके राज्य – प्रबन्ध के विषय में प्रकाश डालती है । यह एक नाटक है और विशाखदत्त का लिखा हुआ है । इसकी रचना पांचवी शताब्दी में हुई बताई जाती है । यह नाटक नन्द वंश के विनाश और मौर्य वंश की स्थापना पर आधारित है । इस नाटक से हमें यह ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त ने कौटिल्य की सहायता से किस प्रकार नन्द वंश का नाश किया था । इसमें यह भी बताया गया है कि चन्द्रगुप्त दासी पुत्र था । वह अतीव सुन्दर थी , जिससे नन्द ने उससे विवाह किया था । इस प्रकार यह नाटक चन्द्रगुप्त को नन्द वंश से सम्बद्ध कर देता है । क्योंकि यह नाटक है ; इसलिए इसमें कल्पना को भी मिश्रण हो सकता है । इसीलिए इसकी प्रत्येक घटना को इतिहासकार ऐतिहासिक नहीं मानते ।

बौद्ध तथा जैनमत की परम्परा ( Jain and Buddhist Traditions )

बौद्ध एवं जैन धर्म की पुस्तकों में भी कुछ ऐसी कथाएं आती हैं जिनसे चन्द्रगुप्त मौर्य के विषय में हमें ज्ञान प्राप्त होता है । जैन धर्म की पुस्तकों में आता है कि चन्द्रगुप्त ने अपने अन्तिम समय में जैन धर्म ग्रहण कर लिया था तथा यह भी उल्लेख मिलता है कि उसने दक्षिण के पर्वतों में जाकर मरणव्रत रख लिया , जिससे उसका शरीर सूख गया और उसकी मृत्यु हो गई थी । इस प्रकार बौद्ध धर्म की परम्पराओं से भी अशोक के विषय में पता चलता है कि अशोक के सौ भाई थे और अशोक अपने 99 भाइयों की हत्या करके स्वयं राज्यसिंहासन पर आसीन हुआ था । बौद्ध ग्रन्थों में लिखा है कि अशोक ने तीसरी बौद्ध सभा बुलाई थी । इनसे अशोक द्वारा अन्य देशों में भेजे गए प्रचारकों का भी पता चलता है ।

पुराण ( The Puranas )

पुराणों से भी इतिहासकारों ने थोड़ी बहुत सामग्री ढूंढ निकाली है । इससे ज्ञात होता है कि नन्द वंश के राजा शूद्र जाति के थे और उच्चकोटि के ब्राह्मण कौटिल्य ने इनके वंश का नाश करके चन्द्रगुप्त को सत्तारूढ़ किया था , परन्तु इनमें भी कल्पना तथा अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन होने के कारण इन पर अधिक विश्वास नहीं किया जा सकता ।

शिलालेख तथा सिके ( Inscriptions and Coins )

चन्द्रगुप्त तथा अशोक के समय के शिलालेखों तथा सिक्कों से भी उनके विषय में महत्त्वपूर्ण ज्ञान की प्राप्ति होती है । अशोक के वे लेख जो पत्थरों एवं स्तम्भों पर खुदे हुए हैं , उनसे हमें अशोक के धर्म , राज्य – प्रबन्ध तथा प्रजा के साथ सम्बन्ध आदि के विषय में ज्ञात होता है कि किस तरह वह प्रजा को अपनी सन्तान ही समझता था । ये लेख अशोक के राज्य – विस्तार के विषय पर भी प्रकाश डालते हैं ।

इसी प्रकार मौर्य काल के सिक्के भी उस काल का इतिहास जानने में पर्याप्त सहायक सिद्ध होते हैं ।

मौर्य काल के स्मारक चिन्ह ( Mauryan Monuments )

मौर्य काल की कलात्मक वस्तुएं एवं खण्डहरों आदि से उस समय की संस्कृति एवं सभ्यता का ज्ञान होता है । उस समय के मठों , गुफाओं तथा विहारों आदि से उस समय की कला तथा संस्कृति का अनुमान लगाया जा सकता है । इनसे उस समय की भवन निर्माण कला तथा पालिश करने आदि की कला का अच्छा परिचय प्राप्त होता है । यही कारण है कि सांची का स्तूप तथा अन्य कई स्रोतों की ऐतिहासिक महत्ता आज भी स्वीकार की जाती है ।

मौर्य साम्राज्य की जानकारी के मुख्य स्त्रोत इन सब जगह से प्राप्त हुए है ।

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