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मेगस्थनीज की पुस्तक इंडिका

मेगस्थनीज की पुस्तक इंडिका

मौर्य वंश के विषय में सर्वप्रथम हमें मेगस्थनीज की पुस्तक ‘ इंडिका ‘ से ज्ञान प्राप्त होता है । मेगस्थनीज सिकन्दर के उत्तराधिकारी सैल्यूकस निकेटोर ( Seleukus Necator ) की ओर से चन्द्रगुप्त के दरबार में एक राजदूत के रूप में आया था । यह माना जाता है कि वह चन्द्रगुप्त की राजधानी पाटलीपुत्र में कोई पांच वर्ष ( 302 ई० पू० से 298 ई० पू० ) तक रहा । इस काल में उसने जो कुछ भारत में देखा , सुना और अनुभव किया उनका वृत्तांत उसने अपनी ‘ इंडिका ‘ ( Indica ) नामक पुस्तक में लिखा है । यह पुस्तक सम्पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है , परन्तु इस पुस्तक के कुछ लेख यूनानी विद्वानों की पुस्तकों में मिलते हैं । जिन विद्वानों ने इस पुस्तक से उद्धरण लिए हैं , इनमें से एरियन ( Arrian ) , प्लिनी ( Pliny ) , स्त्रबो ( Strabo ) आदि विशेष उल्लेखनीय हैं । उसने उस समय के भारत सम्राट् , उसके राज्य – प्रबन्ध , सैनिक – प्रबन्ध , राजधानी अथवा सामाजिक अवस्था का अति सुन्दर वर्णन किया है ।

राजा के विषय में ( About the King )

मेगस्थनीज ने राजा के विषय में बहुत कुछ लिखा है । उसने लिखा है कि राजा का जीवन बहुत ऐश्वर्यपूर्ण था । उसका महल अति सुन्दर था । उसके कमरों में हीरे – जवाहरात जड़े हुए थे तथा स्तम्भों पर सोने चांदी का काम किया था । महल के चारों ओर विशाल उपवन था , जिसमें नाना प्रकार के वृक्ष , पौधे और फल लगे हुये थे । इस उपवन में मोर , तोते तथा कई अन्य प्रकार के पक्षी भी थे । इस उपवन में एक तालाब भी था , जिसमें मछलियां पाली जाती थीं ।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र

मैगस्थनीज़ ने लिखा है कि राजा कभी भी एक कमरे में नहीं सोता था । इसका कारण यह हो सकता है कि चन्द्रगुप्त ने नन्द वश के सभी राजाओं को समाप्त करके राज्य प्राप्त किया था । अतः वह स्वयं भी षड्यन्त्रों से भयभीत होकर ही नित्य अपना शयनकक्ष बदल लेता होगा । मैगस्थनीज़ का यह कथन है कि राजा बहुत कम लोगों से मिलता था , इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है । राजा केवल निम्नलिखित चार कार्यों के लिए अपने महल से बाहर आया करता था : –

  1. युद्ध के प्रस्थान के लिए ,
  2. न्याय के लिए ,
  3. यज्ञ तथा हवन के लिए ,
  4. शिकार तथा पर्यटन के लिए ।

राजमहल के अन्दर स्त्री गुप्तचरों का जाल बिछा हुआ था । कई बार स्त्रियां राजा के साथ , रथा , हाथियों , घोड़ो पर आखेट के समय साथ ही होती थीं । राज्य प्रबन्ध का मुख्य कार्य राजा ने अपने महामात्य चाणक्य अथवा कौटिल्य को सौंप रखा था । राजा उसका बहुत सत्कार करता था । कौटिल्य राजमहल के पास ही एक झोंपड़ी में रहता था ।

राजधानी के विषय में ( About the Capital )

मैगस्थनीज ने मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलीपुत्र के विषय में बहुत कुछ लिखा है क्योंकि वह स्वयं वहां कई वर्ष रहा था । इसको वह ‘ पालिमबोध ‘ कहता था । यह नगर ( अाधुनिक पटना ) गंगा के किनारे स्थित है । इसकी लम्बाई लगभग 80 स्टेडिया ( लगभग 9.50 मील ) और चौड़ाई 15 स्टेडिया ( लगभग 1.75 मील ) मील होगी । यह सुन्दर नगर था , जिसके चारों ओर लकड़ी की दीवार थी और 600 फुट चौड़ी और 30 क्यूबिक फुट गहरी खाई थी । यह खाई हर समय पानी से भरी रहती थी । दीवार ने 570 बुर्जियां थीं और 64 द्वार थे । ये द्वार रात को निश्चित समय पर बन्द कर दिये जाते थे । यह सब कुछ राजधानी की रक्षा के लिए किया गया था । इस प्रकार नगर पूर्णतया सुरक्षित था । इस नगर के प्रबन्ध के लिए पांच – पांच सदस्यों की छः समितियां होती थीं । यह समितियां नगर के सारे प्रबन्ध करती थीं ।

सैनिक प्रबन्ध के विषय में ( About the Military Administration )

मैगस्थनीज ने लिखा है कि चन्द्रगुप्त के पास विशाल सेना थी । उसके अनुमान के अनुसार सेना की संख्या लगभग सात लाख होगी इसमें से 600,000 पैदल , 30,000 घुड़सवार , 8,000 रथ ( प्रत्येक रथ में तीन सैनिक होते थे ) तथा , 9,000 हाथी थे । सेना का प्रबन्ध एक विशेष कमेटी किया करती थी । इसके तीस सदस्य थे । इस कमेटी की आगे पांच पांच सदस्यों की छः समितियां थीं जोकि सेना के एक – एक उप – विभाग का प्रबन्ध करतो थीं । सेना विभाग के छः उप – विभाग थे जो निम्नलिखित हैं :

  1. पैदल सेना ( Infantry )
  2. घुड़सवार सेना ( Cavalry )
  3. जल सेना ( Navy )
  4. रथ ( Chariots )
  5. हाथी ( Elephants )
  6. परिवहन ( Transport )

मौर्य साम्राज्य की जानकारी के मुख्य स्त्रोत

नागरिक प्रशासन के विषय में ( About the Civil Administration )

मैगस्थनीज़ ने चन्द्रगुप्त के नागरिक प्रशासन के विषय में बहुत कुछ लिखा है । उसने लिखा है कि राजा के अधिकार असीमित थे ; फिर भी बहुत सा समय प्रजा की भलाई के लिए लगाता था । प्रजा को कई प्रकार के कर देने पड़ते थे । सरकारी आय का मुख्य साधन भूमि – कर था जो कुल उपज का 1/5  भाग होता था । इसके अतिरिक्त मेला – कर तथा बिक्री – कर भी होते थे । कृषकों की कठिनाइयों का विशेष ध्यान रखा जाता था । उनका इतना आदर किया जाता था कि उनके निकट भी यदि कोई युद्ध हो भी रहा हो तो भी उन्हें कोई हानि नहीं पहुंचाता था । सिंचाई के लिए नहरें बनाई गई थीं । यातायात के लिए सड़कें बनी हुई थीं और सड़कों के दोनों ओर छायादार वृक्ष भी लगे हुए थे । यात्रियों की सुविधा के लिए थोड़ी – थोड़ी दूर पर सरायें बनाई गई थीं , जिनमें यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था होती थी । सड़कों पर मील पत्थर लगे थे । यात्रियों की रक्षा के लिए पुलिस का पूरा – पूरा प्रबन्ध होता था । राजा ने प्रत्येक सूचना को प्राप्त करने के लिए अनेक गुप्तचर छोड़ रखे थे जो हर तरह का समाचार लाकर राजा को देते थे ।

भारतीय समाज के विषय में ( About the Indian Society )

मैगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात श्रेणियों में बांटा था । ये श्रेणियां निम्नलिखित थों : –

  1. पहली श्रेणी दार्शनिकों और विद्वानों की थी , इनका समाज में बहुत आदर सत्कार था ।
  2. दूसरी श्रेणी राज्याधिकारियों की थी । ये राजा की राज्य – प्रबन्ध में परामर्श देते थे ।
  3. तीसरी श्रेणी सैनिकों की थी जो युद्ध के समय युद्ध – क्षेत्रों में जाते थे या फिर आराम करते थे ।
  4. चौथी श्रेणी छोटे – छोटे अधिकारियों की होती थी जो राज्य – प्रबन्ध में राजा तथा राज्यपालों की सहायता किया करती थी ।
  5. पाँचवीं श्रेणी कृषकों की थी , जो देश के लिए अन्न पैदा करती थी और देश को धन – धान्य से समृद्ध रखती थी ।
  6. छटी श्रेणी व्यापारियों और कारीगरों की थी जो देश के व्यापार व शिल्पी उन्नति का ध्यान रखती थी ।
  7. सातवी श्रेणी चरवाही की थी , जिनका जीवन – निर्वाह पशु – पालन या शिकार अादि पर ही होता था ।

लोगों के साधारण जीवन के विषय में मैगस्थनीज़ लिखता है कि उस समय लोग बड़े सदाचारी होते थे । वे सदा सत्य बोलते थे । चोरी आदि बहुत कम होती थी । अपराधों की संख्या कम थी । मुकद्दमेबाज़ी नाममात्र की थी । चोरी आदि का भय न होने से घरों पर ताले बहुत कम लगाए जाते थे । प्रजा पर्याप्त सुखी और समृद्ध थी । अन्न पर्याप्त मात्रा में उत्पन्न होता था और अकाल की स्थिति कम ही होती थी । समाज में ब्राह्मणों का बहुत आदर सत्कार था । लोगों में बुराइयां भी थीं । मेगस्थनीज़ लिखता है कि भारतीय नियमित जीवन भोगने के अभ्यस्त थे । खाने – पीने का कोई विशेष समय नियत नहीं था । शराब भी विशेष अवसरों पर पी जाती थी । मांस का प्रयोग बहुत कम होता था । दूध , लस्सी , शरबत का भी प्रयोग किया जाता था । उस समय बहु – विवाह की प्रथा प्रचलित थी और कन्याओं को उनके माता – पिता से बैलों की जोड़ी देकर प्राप्त किया जा सकता था । उस समय दास – प्रथा नहीं थी । मेगस्थनीज को भारत का गन्ना बहुत पसन्द आया क्योंकि उसने उसकी बहुत प्रशंसा की है ।

भारतीय लोगों के विषय में कुछ विचित्र बातें ( Some strange descriptions about the Indian People )

मेगस्थनीज़ ने अपने समय के भारत के विषय में बहुत कुछ लिखा है , परन्तु यह दोषरहित नहीं कहा जा सकता उसकी कुछ बातें बहुत विचित्र हैं , उन पर सहज में विश्वास नहीं हो सकता । उसने लिखा है कि भारत के कुछ लोगों का कद तीन फ़ीट से ऊंचा नहीं होता था । वह लिखता है कि भारत में इस प्रकार के भी लोग थे , जिनके कान पैरों तक पहुंच जाते थे और रात्रि के समय अपने कानों में ही सो सकते थे । कुछ लोगों के माथे पर तीसरी आंख होती थी कई इस प्रकार के थे जिनका नाक तक नहीं था । कुछ ऐसे भी थे जिनके सिर कुत्तों की तरह होते थे । ऐसा लगता है कि उसने ऐसी व्यर्थ की बाते स्वयं नहीं देखी होंगी अपितु सुनी – सुनाई ही लिख दी होंगी । इस विषय में कृपाल सिंह नारंग ( S Kirpal Singh Narang ) लिखते हैं ” All these are fables and cannot be easily believed . It is therefore that Strabo considers Magasthenese a liar and his account full of fables . ” इस प्रकार वी० ए० स्मिथ ( V . A . Smith ) ने लिखा है कि “ उस ( मेगस्थनीज ) के वर्णन की अनुचित बुराई की गई है क्योंकि उसने अपने वर्णन में कई सुनी – सुनाई , अविश्वसनीय तथा विचित्र बातों को ठीक समझ कर और उनको अपनी पुस्तक में स्थान दे कर उस को अशुद्ध बना लिया । परन्तु इस प्रकार की बातों को एक ओर रख कर मेगस्थनीज की पुस्तक ‘ इंडिका ‘ को मौर्य काल के इतिहास का मुख्य स्रोत माना जाता है ।

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