Monday , 22 July 2019
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चन्द्रगुप्त मौर्य का चरित्र और उसके कार्य

चन्द्रगुप्त मौर्य का चरित्र ( Character of Chandra Gupta Maurya )

चन्द्रगुप्त की निस्सन्देह भारत के महान् राजनैतिक प्रशासकों में गणना होती है । उसे प्रथम भारतीय राष्ट्रीय सम्राट भी कह सकते हैं , जिससे इतिहास में उसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है । उससे पूर्व भारत कई छोटी – छोटी रियासतों में बंटा हुआ था , जिन पर विदेशी घुसपैठिये शीघ्र ही विजय प्राप्त कर लेते थे । उसने इन सभी रियायतों को जीत कर एक शक्तिशाली साम्राज्य की नींव रखी । इससे पूर्व किसी ने भी भारत को एकता के सूत्र में नहीं पिरोया था । यही कारण है कि उसे भारत का प्रथम राष्ट्रीय नायक भी कहा जाता है । | चन्द्रगुप्त ने सारा साम्राज्य अपने बाहुबल से अर्जित किया था । वह स्वयं एक सर्व प्रभुत्व – सम्पन्न शासक था , परन्तु प्रजा की भलाई का विचार उसके दिल में सदैव रहता था । उसके चरित्र की मुख्य – मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं :

सौंदर्य और प्रकृति का पुजारी ( Lover of Beauty and Nature ) << चन्द्रगुप्त मौर्य का चरित्र

चन्द्रगुप्त प्रकृति और सौंदर्य का पुजारी था । उसके राजमहल जो पाटलीपुत्र में बने हुए थे , इसके मुंह बोलते प्रमाण थे । उसके महल ईरान के बादशाहों से भी अधिक सजे हुए थे । विदेशी भी महलों और राजदरबार की शान देकर चकित रह जाते थे । राजभवन के चारों ओर बहुत सुन्दर उद्यान था तथा उसमें सुन्दर झीलें और सरोवर थे , जो सुन्दरता को द्विगुणित कर देते थे । रंग – बिरंगे फूल और बेल बूटे उद्यान की रमणीयता की शोभा थे । इस उद्यान में कई प्रकार के पक्षी पाले हुए थे । इनकी भांति – भांति की बोलियां उद्यान में घूमने वालों का मन मोह लेती थीं । तालाबों व झीलों में रंग – बिरंगी नाना प्रकार की मछलियां पाली गई थीं ।

महल के खम्वों पर सोने और चांदी का काम किया हुआ था । एशिया तथा चीन की समस्त विलासिता की वस्तुएं महल में ही मिल जाती थीं । सोने – चांदी के हीरे जवाहरोतों से जड़ित मेज़ देखने वाले को चकित कर देते थे । यूनानी लेखकों के अनुसार चन्द्रगुप्त सोने की पालकी में बैठकर सुन्दर बहुमूल्य परिधान पहने लोगों के समक्ष आता था । यह सभी बातें इस बात को प्रमाणित करती हैं कि वह सौंदर्य का बहुत प्रेमी था । इस वैभवपूर्ण जीवन के बावजूद भी प्रजा की भलाई का विचार उसके दिल में सदैव रहता था ।

परिश्रमी ( Hardworker ) << चन्द्रगुप्त मौर्य का चरित्र

चन्द्रगुप्त सारा समय रंग – रलियो अरि मनोरंजन में ही नहीं व्यस्त रहता था । वह प्रथम श्रेणी का परिश्रमी था । बचपन से ही उसे परिश्रम की आदत थी इसलिए वह उन्नति करता – करता राजा बन गया था । वह सारे दिन में कभी भी विश्राम नहीं करता था या सोता नहीं था । वह प्रजा के कायों में ही लगा रहता था ।

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कला तथा साहित्य का प्रेमी ( Lover of Art and Literature ) << चन्द्रगुप्त मौर्य का चरित्र

उसका साहित्य और कला के प्रति बहुत लगाव था । उसके काल में भवन – निर्माण कला , चित्रकला तथा साहित्य को बहुत प्रोत्साहन मिला । उसका अपना दरबार बहुत कलात्मक ढंग से सजाया हुअा था जो उसका कला के साथ अधिक स्नेह प्रमाणित करता है । इसी काल में कौटिल्य जैसे महान् राजनीतिज्ञ . भी हुए थे । ‘ अर्थशास्त्र ‘ तथा ‘ कल्पसूत्र ‘ आदि प्रसिद्ध रचनाएं उसके काल की प्रसिद्ध कृतियां हैं ।

धार्मिक रुचियों का स्वामी ( Lover of Religious Dogmas )

चन्द्रगुप्त मौर्य धार्मिक रुचियों वाला व्यक्ति था । वह एक उच्चकोटि का राजनीतिज्ञ होते हुए भी धर्म का पालन करता था । वह हिन्दू धर्म का अनुयायी था । वह तीन अन्य अवसरों के अतिरिक्त हवन करने के लिए भी महल से बाहर कदम रखा करता था । इससे चन्द्रगुप्त की हिन्दू धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा का पता चलता है । यह बात उसकी महानता की ही प्रतीक है कि स्वयं हिन्दू धर्म का अनुयायी होते हुए भी अन्य धर्मों के अनुयायियों पर अत्याचार नहीं किया । वह प्रत्येक धर्म का अादर करता था । वह हर सत्य को जानने के लिए उत्सुक रहती था । जैन धर्म की परम्पराओं के अनुसार उसने अन्त में जैन धर्म को स्वीकार कर लिया और अन्त में व्रत रखकर अपने शरीर का परित्याग किया था ।

आखेट प्रेमी ( Lover of Hunting )

चन्द्र गुप्त मौर्य को आखेट का बहुत चाव था । उसने इस उद्देश्य के लिए अपने विशेष वन निर्धारित किए हुए थे , जहां साधारण लोग नहीं जा सकते थे । आखेट के समय उसकी अंगरक्षक ( Body Guards ) स्त्रियां भी साथ होती थीं । वैसे वह कई पशु – पक्षियों को बहुत प्यार करता था , जिनमें हिरण , पालतू चीता , कबूतर , बतख तथा सारस अादि विशेष उल्लेखनीय हैं ।

न्यायप्रिय ( Lover of Justice )

चन्द्रगुप्त महान् न्यायप्रिय शासक था । वह प्रत्येक ढंग से न्याय करना चाहता था ; अतः उसने सारे देश में न्यायालय खोल रखे थे । सर्वोच्च न्यायाधीश वह स्वयं ही होता था । वह शिकायतें सुनता था और निष्पक्ष निर्णय देता था । दोषियों को कड़ा दण्ड दिया जाता था । अपराधियों का पता लगाने के लिए उसने अनेक गुप्तचर छोड़ रखे थे ।

एक वीर योद्धा ( A Brave Man )

चन्द्रगुप्त महान् योद्धा था । उसमें वीरता , उत्साह आदि की कोई कमी नहीं थीं । कठिन समय में भी वह घबराता नहीं था । उसने अपने बाहुबल से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी ।

एक कूटनीतिज्ञ ( A Clever Diplomat )

चन्द्रगुप्त मौर्य एक चतुर कूट नीतिज्ञ था । यही कारण है कि वह साधारण व्यक्तित्व का होते हुए भी चाणक्य जैसे विद्वान् के साथ मित्रता करके एक महान् सम्राट् बन गया । अपनी नीति निपुणता के कारण ही उसने पंजाब में शक्तिशाली सेना संगठित कर ली और यहां के कुछ राजाओं को अपने साथ मिलाकर शक्तिशाली नन्द वंश का विनाश कर दिया था ।

दयालु तथा स्वयं सर्वप्रभुत्व सम्पन्न शासक ( A Benevolent Despot )

चन्द्रगुप्त दयालु तथा स्वयं सर्वप्रभुत्व सम्पन्न शासक था । उसका राज्य – प्रवन्ध अति कड़ा था । साधारण अपराधों पर कठोर दण्ड दिए जाते थे । राज्य नियम अति कठोर थे । एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए अधिक स्वतन्त्रता नहीं थी परन्तु यह सारी कठोरता जनता की भलाई के लिए थी । वह कभी भी प्रजा के अहित की नहीं सोचता था । प्रजा के सुख के लिए वह अपने सुखों को भी तिलाँजलि दे देता था । छोटे – छोटे राज्यों से इतना विशाल साम्राज्य स्थापित करना और फिर वहां पर पूर्णरूपेण शान्ति बनाए रखना कोई तुच्छ कार्य नहीं ।

इन विशेषताओं के अतिरिक्त उसके चरित्र की अन्य विशेषताएं भी थीं । वह सहिष्णुता का स्वामी था । वह उदार – चित्त व्यक्ति था । सैल्यूकस की पुत्री से विवाह करके उसने अपने विशाल हृदय का परिचय दिया ।

चन्द्रगुप्त की उपलब्धियां ( Achievements of Chandra Gupta )

चन्द्रगुप्त मौर्य अपनी कुशल बुद्धि व शूरवीरता के कारण एक महान् विजेता तथा सफल प्रबन्धक हुआ है । उसकी उपलब्धियों का वर्णन निम्नलिखित है :

महान् विजेता के रूप में ( As a Great Conqueror )

चन्द्रगुप्त एक महान् विजेता था जिसने अपने अद्भुत शौर्य , अद्वितीय शक्ति तथा अनथक प्रयत्नों से छोटे से मगध राज्य को एक महान् साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया था । उसकी महानता यह थी कि वह जिधर देखता , सफलता उसके कदम चूमती थी । जिस प्रकार मगध का राज – सिहासन उसने प्राप्त किया , यह उसकी वीरता , बुद्धिमत्ता तथा चतुरता का ही प्रमाण है । इसलिए एक विजेता के रूप में अनेक इतिहासकार उसकी अकबर तथा नैपोलियन से तुलना करते हैं ।

पहले उसने पंजाब में से सेना एकत्र की । कैसे की ? यह उसकी प्रखर बुद्धि का प्रमाण है । फिर कौटिल्य की सहायता से पंजाब में से यूनानियों को मार भगाया तथा पंजाब को स्वतन्त्र करवाया । यह सत्य है कि यह उसकी महान् विजय थी । इसके बाद नन्द राजा को पराजित कर उसने मगध राज्य पर अपना अधिकार कर लिया । इस प्रकार धीरे – धीरे दक्षिण में अनेक विजय प्राप्त कीं । अन्त में उसके साम्राज्य में ( कलिंग को छोड़कर ) समस्त भारत , अफ़गानिस्तान तथा बिलोचिस्तान भी सम्मिलित थे । अन्य किसी राजा ने भारत से बाहर जाने का साहस नहीं किया । मुगल सम्राट् का राज्य भारत की प्राकृतिक सीमा से बाहर न जा सका । अंग्रेज़ भी दृढ़ता से उत्तर – पश्चिमी प्रदेश में अपना राज्य स्थापित न कर सके । इसलिए चन्द्रगुप्त की इन प्रदेशों पर विजय को एक महान् कार्य कहा जा सकता है ।

प्रशासक के रूप में ( As an Administrator )

इतिहास में चन्द्रगुप्त मौर्य ने विजेता होने के साथ – साथ एक सफल प्रशासक होने के भी प्रमाण दिए हैं । कुछ लोग तो उसे इतिहास में प्रथम प्रशासक मानते हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं कि राज्य पर उसका एकाधिपत्य था , परन्तु प्रजा की भलाई उसने कभी आंखों से ओझल नहीं की थी ।सारे साम्राज्य में शांति बनाए रखी और सारे राज्य – प्रबन्ध को एक ही प्रणाली पर चलाया । कहा भी अव्यवस्था न फैलने दी ।

प्रान्तों का प्रबन्ध कुमार करते थे , नगरों का प्रबन्ध नगर अधीक्षक करते थे । नगर प्रबन्ध इतना सफल व उच्चकोटि का था कि उसका प्राचीन इतिहास में अन्य उदाहरण नहीं मिलता । प्रजा की भलाई के लिए उसने सड़के बनवाई और अस्पताल खोले । इसी प्रकार कृषकों की भलाई के लिए भी उसने बहुत कुछ किया । कृषि की उन्नति के लिए नहरों का प्रबन्ध किया तथा दक्षिण में सुदर्शन झील बनवाई । उसका न्याय – प्रबन्ध भी बहुत सफल था । देश में न्यायालयों का जाल बिछा हुआ था । वह स्वयं ही सर्वोच्च न्यायाधीश था । प्रजा के काम में तल्लीन वह कभी दिन में नही सोता था ।

चन्द्रगुप्त की इन्हीं विशेषताओं के कारण ही उसकी अकबर तथा सिकन्दर से तुलना की जाती है । एक विद्वान् तो चन्द्रगुप्त को इन दोनों से भी अधिक ऊंचा मानता है । यही कारण है कि वह भारत के महान् सम्राटों में ही नहीं संसार के महान् सम्राटो में गिना जाता है ।

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