Wednesday , 24 July 2019
Home / सामान्य ज्ञान / इतिहास / चन्द्रगुप्त की विजयें

चन्द्रगुप्त की विजयें

चन्द्रगुप्त की विजयें

पंजाब की विजय ( Conquest of Punjab )

चन्द्रगुप्त की सिकन्दर , से भेंट हुई , परन्तु उससे चन्द्रगुप्त को कुछ न मिला फिर विष्णुगुप्त कौटिल्य ( चाणक्य ) के साथ चन्द्रगुप्त ने एक योजना बनाई । चाणक्य भी नन्द वंश का नाश करना चाहता था और चन्द्रगुप्त तो उसका शत्रु था ही । साथ ही सिकन्दर के भारत से जाने के बाद उसके विजित प्रदेशों में गड़बड़ फैल गई । भारतीय यूनानियों को अपना शासक नहीं मान सकते थे । इस अवसर का चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने पूरा – पूरा लाभ उठाने का प्रयत्न किया । उन्होंने पंजाब के विभिन्न भागों से कबाइली जातियों को भड़का कर स्वयं एक छोटी – सी सेना तैयार कर ली । इस सेना का नेतृत्व चन्द्रगुप्त के हाथ में ही था । अब चन्द्रगुप्त मौर्य ने उस सेना की सहायता तथा चाणक्य की बुद्धि से यूनानियों के विरुद्ध स्वतन्त्रता के लिए विद्रोह किया । यूनानी पदाधिकारी पहले ही डावांडोल थे , परन्तु 323 ई. पू. सिकन्दर की मृत्यु के समाचार ने उन्हें और भी अशक्त व निराश कर दिया । इससे चन्द्रगुप्त का कार्य और भी सुगम हो गया । अन्ततः चन्द्रगुप्त ने उत्तर – पश्चिमी भारत में यूनानियों को बहुत बुरी तरह परास्त किया और उन्हें उत्तर – पश्चिमी भारत से निकाल बाहर किया । इस प्रकार 322 – 321 ई. के लगभग चन्द्रगुप्त मौर्य ने पंजाब पर अपना अधिकार कर लिया । जस्टिन ( Justin ) ने लिखा है , “ भारत ने सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् अपने गले से गुलामी का फंदा उतार कर फेंक दिया और उसके गवर्नरों को मौत के घाट उतार दिया । इस स्वतन्त्रता का नेता सांडरों कोटस ( चन्द्रगुप्त ) था । “

मगध चन्द्रगुप्त की विजयें ( Conquest of Magadha )

पंजाब से यूनानियों को बाहर निकालने के बाद चन्द्रगुप्त ने मगध राज्य पर आक्रमण करने की तैयारी की । इस कार्य में चाणक्य भी उसके साथ था , जिसने मगध के नन्द वंश का समूल नाश करने की सौगन्ध खाई थी । चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध के राजा नन्द की शक्ति का पता चल चुका था । राजा नन्द के पास बहुत विशाल सेना थी । यह माना जाता है कि उस समय नन्द के पास 200,000 पैदल , 20,000 घुड़सवार , 2,000 रथ तथा 3,000 हाथी थे । यही कारण हैं डॉ० टॉसम ( Dr . Thomas ) ने लिखा है कि मगध पर आक्रमण करते समय चन्द्रगुप्त ने पंजाब के एक अन्य राजा ( प्रवर्तक ) ( Parvartak ) को साथ मिला लिया था । उनका विचार है कि प्रवर्तक कोई अन्य राजा नहीं अपितु पोरस ही था , जिसने सिकन्दर का डटकर सामना किया था । इस प्रकार भारी सेना के साथ चन्द्रगुप्त मौर्य ने मगध पर अाक्रमण कर दिया । मगध का राजा नन्द अति विलासी था । वह अपने ऐश्वर्य में ही लीन रहा और चन्द्रगुप्त की शक्ति का अनुमान न लगा सका । जब चन्द्रगुप्त की सेना सिर पर आ गई तो नन्द ने अपने सेनापति भद्दसाल ( Bhaddassala ) को बहुत भारी सेना देकर उसका सामना करने के लिए भेजा । एक बड़ा भयानक युद्ध हुआ । युद्ध में खून की नदियां बहने लगीं तथा अगिणत सैनिक हताहत हुए , परन्तु अन्तिम विजय चन्द्रगुप्त को हुई । कहा जाता कि इस युद्ध में राजा प्रवर्तक भी मारा गया । विजय के बाद प्रवर्तक के पुत्र मलयकेतु ने चन्द्रगुप्त से राज्य का आधा भाग मांगा तो चन्द्रगुप्त ने साफ़ इन्कार कर दिया । इस पर मलयकेतु नन्द वंश के कुछ अन्य सरदारों से मिलकर चन्द्रगुप्त के विरुद्ध हो गया और युद्ध की घोषणा कर दी , चन्द्रगुप्त के सामने उसकी पेश न चली और वह पराजित होकर पकड़ा गया ।

मौर्य साम्राज्य की जानकारी के मुख्य स्त्रोत

यह भी विचार किया जा सकता है कि युद्ध में नन्द वंश का अन्तिम राजा तथा अन्य कई राजकुमार मारे गए । एक वृद्ध आदमी इस वंश में बच गया । वह जंगलों में सन्यासी के रूप में रहा करता था । चाणक्य ने अपने अादमी भेजकर उसे भी मरवा दिया क्योंकि वह पूर्ण रूप से नन्द वंश का नाश करना चाहता था । परन्तु जैनियों के एक ग्रन्थ में यह लिखा है कि चाणक्य ने नन्द राजा को , दो पत्नियों तथा कन्या को पाटलीपुत्र छोड़ देने की आज्ञा दी थी । उन्हें एक रथ सामान से भरा हुआ ले जाने की आज्ञा दे दी थी । इस प्रकार चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ई. पू. में मगध पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया था और उसका राज्य तिलक 322-321 ई. पू. में हो गया था । मगध की विजय से समस्त उत्तरी भारत चन्द्रगुप्त के अधीन हो गया था ।

सैल्यूकस के साथ युद्ध ( War with Seleucus 306 B . C . )

पंजाब तथा मगध के बाद चन्द्रगुप्त की तीसरी महान् विजय सैल्यूकस के विरुद्ध थी । जिस समय सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् उसके सेनापतियों में गृहयुद्ध छिड़ गया , उस समय विशेष शत्रुता सैल्यूकस और एण्टीगोनस की थी । इसमें सैल्यूकस की जीत हुई । उसने सिकन्दर का समस्त एशियाई यूनानी साम्राज्य अपने अधिकार में कर लिया वैसे भी सैल्यूकस दृढ़ विचारों वाला सेनापति ( General ) था । वह भी सिकन्दर की भांति सारे भारत पर अधिकार कर लेने के स्वप्न ले रहा था । उसने 306 ई. पू. में निकेटर ( Nicator ) की उपाधि धारण की ।

यूनानी साम्राज्य को पूर्ण रूप से अपने अधिकार में करके उसने भारत में सिकन्दर द्वारा विजित प्रदेशों को पुनः अपने अधीन करने के लिए भारत पर 305 ई. पू. में आक्रमण कर दिया , परन्तु अब भारत की राजनैतिक अवस्था बहुत बदल चुकी थी । चन्द्रगुप्त मौर्य अपने पांव दृढ़ कर चुका था । उसकी सहायता के लिए चाणक्य जैसा नीतिकुशल प्रधानमन्त्री था । इनके युद्ध का पूर्ण विवरण ज्ञात नहीं होता परन्तु सैल्यूकस की करारी हार हुई थी । अन्त में इसने उस युद्ध के बाद चन्द्रगुप्त से सन्धि कर ली । इसके द्वारा उसने अपनी पुत्री हैलन का विवाह चन्द्रगुप्त से कर दिया । इसके साथ ही उसने राज्य के चार प्रदेश हरात ( Herat ) , कन्धार ( Kandhar ) , काबुल ( Kabul ) तथा बिलोचिस्तान ( Baluchistan ) चन्द्रगुप्त को दे दिए । चन्द्रगुप्त के सम्बन्ध सैल्यूकस के साथ मैत्रीपूर्ण हो गए । चन्द्रगुप्त ने यूनानियों को पांच सौ हाथी दिये । सैल्यूकस ने मैगस्थनीज़ को अपना राजदूत बना कर चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा । डॉ० आर० सी० मजूमदार ( Dr . R . C . Majumdar ) लिखते हैं कि “ चन्द्रगुप्त का सैल्यूकस पर विजय ने महान् यूनानी सेनाओं की भारतीय युद्ध कला और अनुशासन के टकराव में आन्तरिक शिथिलताओं को सिद्ध कर दिया । “

इस विजय से यूनानियों को भारत पर पुनः आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ । चन्द्रगुप्त की शक्ति का सिक्का सम्पूर्ण भारत पर जम गया । इसका राज्य अफ़गानिस्तान तक फैल गया था । यह प्रथम भारतीय सम्राट था , जिसकी प्रसिद्धि इतनी दूर – दूर तक फैल चुकी थी ।

पश्चिमी भारत पर चन्द्रगुप्त की विजयें ( Conquest of the Western India )

इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि पश्चिमी भारत पर चन्द्रगुप्त का ही आधिपत्य था । भाव यह कि आज के गुजरात और कठियावाड़ भी राज्य के अंग थे । राजा रुद्रदमन ( Rudradaman ) के गिरनार शिलालेखों ( Girnar Inscription ) में इस बात का उल्लेख अाता है कि सुदर्शन झील पुष्यगुप्त ने , जो वैश्य जाति का था , सिंचाई के लिए बनवाई थी । वह चन्द्रगुप्त के प्रतिनिधि के रूप में ही यहां राज्य करता था । सौराष्ट्र का प्रांत मौर्यों के अधिकार में था ।

दक्षिणी भारत पर चन्द्रगुप्त की विजयें ( Conquest of South India )

ऐसा प्रतीत होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने दक्षिणी भारत के प्रदेशों पर भी अपना अधिकार कर लिया था । कुछ लेखों से यह ज्ञात होता है कि उसका सम्बन्ध मंसूर के साथ भी था । हमें अशोक के विषय में इतना ही ज्ञात है कि उसने कलिङ्ग पर विजय प्राप्त की थी । यह भी पुष्ट प्रमाण है कि अशोक का राज्य दक्षिण तक फैला हुआ था । इस से यह सिद्ध होता है कि उसके पूर्वजों ने दक्षिण प्रदेश भी जीता हुआ था , जो अशोक को पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त हुआ था ।

यह भी कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने समस्त भारत को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी । प्लूटार्च ( Plutarch ) लिखते हैं ” चन्द्रगुप्त ने अपने 6 लाख सैनिकों की सहायता से सारे भारत पर आक्रमण किये और अधिकार जमाया । ”

चन्द्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य का विस्तार ( Extent of Empire )

यह सत्य है कि इतिहास में चन्द्रगुप्त की विजयों का विस्तार पूर्वक विवरण नहीं मिलता , परन्तु इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि उसने अल्प – काल में ही मगध राज्य को एक विशाल साम्राज्य बना दिया था । उसके साम्राज्य में सम्पूर्ण भारत ( काश्मीर , कलिङ्ग तथा सिन्ध को छोड़कर ) सारा बिलोचिस्तान तथा आधुनिक अफ़गानिस्तान भी सम्मिलित थे । उसका राज्य पूर्वी बंगाल से लेकर उत्तर – पश्चिम तक तथा हिन्दुकुश पर्वत से लेकर पश्चिम में अरब सागर तक फैला हुआ था । दक्षिण में उसके राज्य की सीमा नर्बदा और विन्ध्याचल पर्वत थी ।

चन्द्रगुप्त का देहावसान ( Death of Chandragupta Maurya )

चन्द्रगुप्त ने लगभग 24 वर्ष तक राज्य किया । जैन धर्म के लेखों से ज्ञात होता है कि अन्तिम दिनों में चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म स्वीकार कर लिया था । वह मैसूर के पर्वतों पर तप करने के लिए चला गया और वहीं पर उसने उपवास द्वारा अपने शरीर का अन्त कर दिया था । यह घटना 298 ई. पू. की है ।

चन्द्रगुप्त की विजयें इन सब जगह थी ।

Check Also

जल के गुण

जल एक रसायनिक पदार्थ है जिसका रसायनिक सूत्र H2O है: जल के एक अणु में दो हाइड्रोजन के परमाणु सहसंयोजक बंध के द्वारा एक ऑक्सीजन के …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *