Tuesday , 16 July 2019
Home / सामान्य ज्ञान / इतिहास / कौटिल्य का अर्थशास्त्र

कौटिल्य का अर्थशास्त्र

कौटिल्य का अर्थशास्त्र

अर्थशास्त्र के लेखक चाणक्य हैं । यह पुस्तक मौर्य काल के इतिहास के लिए दूसरा स्रोत है । चाणक्य को विष्णु गुप्त भी कहा जाता है । कौटिल्य तो उसे उसकी पुस्तक ‘ अर्थशास्त्र ‘ के कारण कहा जाता है क्योंकि इस पुस्तक में राजाओं के लिए कुटिल नीति पर बहुत से उत्तम सिद्धान्त दिए गए हैं । चाणक्य चन्द्रगुप्त का प्रधानमन्त्री था । परन्तु इस पुस्तक का मुख्य भाग उसने प्रधानमन्त्री पद ग्रहण करने से पूर्व लिखा था । जब वह प्रधानमन्त्री बना तब उसने इस पुस्तक के राज्य सिद्धान्तों के अनुसार ही राज्य का संचालन किया । इस पुस्तक के 15 भाग हैं । इसमें राजा के कर्तव्य , युद्ध करने के ढंग , कुटनीति के नियम तथा शासन प्रबन्ध को कुशल बनाने के सिद्धान्तों के विषय में वर्णन किया गया है ।

चन्द्रगुप्त को राजसिंहासन पर बिठाने में चाणक्य का प्रमुख हाथ था । उसका लिखा हुआ यह ग्रंथ इतिहासकारों के लिए बहुत लाभदायक है क्योंकि इस ग्रंथ से चन्द्र गुप्त के राज्य – प्रबन्ध का सारा ज्ञान हो जाता है । इस ग्रन्थ में राजा के कर्तव्य , युद्ध के ढंग और राज्य – प्रबन्ध के विषय में उत्तमोत्तम विचार दिए गए हैं । इसे राजनीति – शास्त्र की एक उच्चकोटि की पुस्तक माना गया है । विदेशी लेखक विटरनिटज ( Winternitz ) ने इस पुस्तक की महत्ता के विषय में लिखा है कि ” प्राचीन भारत के राज्य – प्रबन्ध , व्यापार , युद्ध एवं शान्ति आदि विषयों पर प्रकाश डालने वाली यह एक अद्वितीय पुस्तक है । “ एक अन्य विद्वान् ने इस पुस्तक की तुलना मैकेवाली ( Machiavelli ) की पुस्तक ‘ प्रिंस ‘ ( Prince ) से की है । कुछ विद्वान् इसे वह अमृत बताते हैं जो राजनीतिक बुद्धि को मथ कर निकाला गया हो । डॉ० त्रिपाठी ( Dr . Tripathi ) ने इसके विषय में लिखा है , ” इसके महत्व के विषय में यह कहना अति कथनी न होगा कि यह प्राचीन भारतीय इतिहास की अद्वितीय रचना है । “ यह पुस्तक मौर्यों के राज्य – प्रबन्ध के बारे में तथा अन्य ऐतिहासिक सामग्री – प्रदान करती है ।

राजा तथा उसके आदर्शों के विषय में ( About the King and his Ideals ) << कौटिल्य का अर्थशास्त्र

वीर राजा ( Brave King )

चाणक्य के अनुसार प्रत्येक राजा को वीर तथा योद्धा होना चाहिए । उसके पास पर्याप्त सेना होनी चाहिए । उसे अपने राज्य विकास के लिए यत्न भी करने चाहिएं । चाणक्य का यह विचार है कि राजा को अपने सैनिकों के मन में यह भावना भर देनी चाहिए कि युद्ध धर्म की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा है । उसका विचार है कि सैनिक धर्म के लिए अधिक वीरता और उत्साह से लड़ते हैं और सफलता भी प्राप्त करते हैं । उनका तो यहां तक कहना है कि विजय – प्राप्ति के लिए छल , कपट तथा धोखेबाज़ी भो बुरी नहीं है चाणक्य धर्म – युद्ध का पक्षपाती नहीं था ।

राजा का प्रदर्श – प्रजा की भलाई ( King ‘ s ideal – welfare of the People )

चाणक्य का विचार है कि राजा को एकदम निरंकुश ( Absolute ) होना चाहिए । उसकी शक्ति पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं होना चाहिए । सरकार उसके संकेतों पर नाचती होनी चाहिए । ब्राह्मणों का सम्मान होना चाहिए और राजा को मन्त्रियों से परामर्श लेना चाहिए । निरंकुश होने का यह . अभिप्राय नहीं कि वह प्रजा पर अत्याचार करे । उसे प्रजा की भलाई के कार्य करने चाहिएं उसे स्वयं परिश्रमी और विद्वान् होना चाहिए । उसे प्रजा की शिकायतें सुनने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए । उसे भोग – विलास में अपने जीवन का बहुमूल्य समय नहीं गंवाना चाहिए अपितु प्रजा की खुशी , सुख एवं भलाई के लिए दिन – रात परिश्रम करना चाहिए ।

राजा के छः बड़े – बड़े शत्रु ( Six Great Enemies of the King ) << कौटिल्य का अर्थशास्त्र

चाणक्य ने राजाओं को निम्नलिखित छ : शत्रुओं से दूर रहने की शिक्षा दी है :

  1. काम ( Lust )
  2. क्रोध ( Anger )
  3. लोभ ( Greed )
  4. अहंकार ( Vanity )
  5. अहं ( Haughtiness )
  6. ऐश्वर्य ( Pleasure )

इन बुराइयों के कारण बड़े – बड़े महान सम्राट भी नष्ट हो गए अतः सफल राजा इनसे बचकर रहूते हैं और उन्हें रहना भी चाहिए ।

राजा के मन्त्रियों के विषय में ( About the King ‘ s Ministers ) << कौटिल्य का अर्थशास्त्र

कौटिल्य ने लिखा है कि राजा को ठीक ढंग से राज्य – प्रबन्ध चलाने के लिए मन्त्री अवश्य रखने चाहिएं । दूसरे शब्दों में , मन्त्रियों को राज्य – प्रबन्ध का महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता है । उसने लिखा है कि जैसे दो पहियों के बिना गाड़ी नहीं चल सकती उसी प्रकार राजा तथा मन्त्री रूपी पहियों के बिना प्रशासन रूपी गाड़ी नहीं चल सकती । परन्तु उसने लिखा है कि मन्त्री नियुक्त करते समय यह देखना आवश्यक है कि वे उच्च वश के हो , उच्चकोटि के विद्वान् हों , नीति – निपुण तथा शूरवीर हों तथा स्वामिभक्त भी हों । राजा इन मन्त्रियों का परामर्श ले सकता है । लेकिन यदि वह इसे परामर्श को अनुचित समझे तो वह इसे एक ओर रखकर अपनी मनमानी भी कर सकता है ।

कौटिल्य का कहना है कि मन्त्रियों आदि के साथ परामर्श गुप्त होना चाहिए । ” दीवारों के भी कान होते हैं “ के सिद्धान्त को मानना चाहिए क्योंकि उसका विचार था जो राजा अपने भेद छिपा कर नहीं रख सकता वह चिरकाल तक नहीं टिक सकता ।

मौर्य साम्राज्य की जानकारी के मुख्य स्त्रोत

गुप्तचर विभाग के प्रबन्ध के विषय में ( About the Espionage System )

कौटिल्य के अनुसार उत्तम राज्य – प्रबन्ध के लिए गुप्तचरों की सहायता बहुत आवश्यक है । उसका विचार है कि ज़िला , प्रान्त तथा नगरों के प्रबन्ध के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए तथा उनके अधिकारियों पर समुचित नज़र रखने के लिए राजा को अपने गुप्तचर छोड़ने चाहिएं । ये गुप्तचर बड़े – बड़े अधिकारियों की प्रतिदिन की कार्य – वाहियों की सूचना सम्राट् तक पहुंचाएं । कौटिल्य का विचार है कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां जासूसी के कार्य में अधिक उपयुक्त हो सकती हैं ; अतः स्त्रियों को उच्च पद का गुप्तचर नियुक्त करना चाहिए । अन्य देशों में भी अपने गुप्तचर भेजने चाहिए ताकि समय – समय पर उनकी सही विचारधारा का पता लगता रहे । चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने राज्यकाल में कौटिल्य की सहायता से भारी संख्या में गुप्तचर रखे हुए थे , जिनकी सहायता से उसका सफल राज्य – प्रबन्ध चल रहा था । गुप्तचर बोलचाल में संकेत शब्दों ( Code words ) का प्रयोग करते थे ।

प्रजा की आर्थिक अवस्था के विषय में ( About the Economic Condition of the People )

कौटिल्य का विचार था कि किसी राजा का सबसे बड़ा अवगुण उसकी प्रजा की अपनी निर्धनता है । जब लोगों के पास खाने – पीने को न हो तो वे अन्य सुख – सुविधाओं के होते हुए भी विद्रोह कर देते हैं ; परन्तु जब खाने – पीने के लिए हो तो अन्य कठिनाइयों के होते हुए भी वे चुप रहते हैं ; अतः राजा को देश की आर्थिक अवस्था के विषय में बहुत सतर्क रहना चाहिए । खाद्यान्न का उचित प्रवन्ध रखना चाहिए । उसे अपनी प्रजा को समृद्ध बनाना चाहिए । उसके राज्य में प्रत्येक व्यक्ति को भरपेट भोजन तथा शरीर ढकने के लिए वस्त्र अवश्य मिलने चाहिए । किसी देश में क्रान्ति का मुख्य कारण उस देश की निर्धनता होती है ।

चाणक्य ने लिखा है , ” किसी भी राज्य के लिए लोगों की गरीबी बुराइयों को बुराई है , भाव सबसे बड़ी बुराई है । जब उनके पास प्रतिदिन की आवश्यकताओं के साधन होते हैं तो उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु इन साधनों के अभाव से वह स्वयं ही शत्रु – पक्ष की ओर जा मिलते हैं या अपने ही राज्य के स्वामी के नाश का कारण बनते हैं । ”

प्रान्तीय प्रबन्ध के विषय में ( About the Provincial Administration )

कौटिल्य ने चन्द्रगुप्त के प्रान्तीय – प्रबन्ध के विषय में भी लिखा है । उसने लिखा है कि उसका साम्राज्य प्रान्तों में बंटा हुआ था । प्रान्त फिर जिलों में बंटे हुए थे । जिले में कई गांव होते थे । प्रान्तों का मुख्य अधिकारी राज्यपाल होता था जो सामान्यतया राज – परिवार के राजकुमार ही होते थे । उसे 12,000 पन ( Pana ) वार्षिक वेतन मिलता था । इस प्रकार के छोटे से प्रान्त को ” राष्ट्रीय “ कहा जाता था । जिले के अधिकारियों को स्थानिक ( Sthanik ) कहा जाता था तथा ग्राम्य के अधिकारियों को ‘ गोप ‘ ( Gope ) कहा जाता था ।

नगर – प्रबन्ध के विषय में ( About the Administration of Towns )

कौटिल्य ने बड़े – बड़े नगरों और राजधानी के प्रबन्ध के विषय में भी अपने विचार प्रस्तुत किए हैं । वह लिखता है कि राजधानी के प्रबन्ध को चार भागों में बांटा हुआ था । नगर के प्रशासन का सबसे बड़ा अधिकारी प्रमुखिया ( Mayor ) होता था । हर भाग के मुख्याधिकारी को स्थानिक ( Sthanik ) कहा जाता था । उसकी सहायता के लिए छोटे – छोटे अधिकारी होते थे जिन्हें गोप ( Gope ) कहा जाता था ।

सजाएं ( Punishments )

कौटिल्य ने लिखा है कि अपराधियों को भयभीत करने के लिए बड़े कठोर दण्ड दिए जाते थे । चोरी करने वालों को तथा राज दोहियों को मृत्यु – दण्ड दिया जाता था ।

जहाजरानी के विषय में ( About Shipping )

कौटिल्य ने चन्द्रगुप्त के समय को जहाजरानी के विषय में भी प्रकाश डाला है । इससे इस बात का प्रमाण मिलता है कि उस समय समुद्री यात्राएं होती थीं । कई बन्दरगाहें थीं , जिनके भिन्न भिन्न अधिकारी होते थे । ये अधिकारी ही उन नावों व जहाज़ों को देद – भाल करते थे तथा आने – जाने वाली नावों और जहाजों से कर भी लिया करते थे । सामान्यतया जहाज़ सरकारी ही होते थे ।

Check Also

जल के गुण

जल एक रसायनिक पदार्थ है जिसका रसायनिक सूत्र H2O है: जल के एक अणु में दो हाइड्रोजन के परमाणु सहसंयोजक बंध के द्वारा एक ऑक्सीजन के …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *