Tuesday , 16 July 2019
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अशोक का प्रारम्भिक जीवन

अशोक का प्रारम्भिक जीवन

इतिहास ऐसे अनेकों राजाओं के विवरण से भरा पड़ा है जिन्होंने साम्राज्य विस्तार की लालसा में अंधे हो खून की होली खेली और अपनी विजयों पर ठहाके पर ठहाके लगाए । उनका पत्थर दिल युद्ध – भूमि के घिनौने दृश्यों , मासूम अनाथ बच्चों की चीखों , विधवाओं के विलाप तथा बेसहारा माताओं तथा बहिनों के चीत्कार से पिघल कर मोम न हुआ और वे अपनी विजय के उल्लास में ही मदमस्त रहे । इतिहास के रंगमच पर एक सम्राट् अशोक भी आया जिसने कलिंग का युद्ध लड़ा और विजय भी प्राप्त की । परन्तु उसे अपनी विजय में भी पराजय मुंह चिढ़ाती दिखाई दी । कलिंग के युद्ध में बहा बेगुनाह सिपाहियों का खून , भोले – भाले अनाथ बच्चों की आंखों से टपकते आंसू , बेसहारा विधवाओं , माताओं और बहिनों का मर्मस्पर्शी चीत्कार पुकार – पुकार कर अशोक से उसके जुल्मों का इन्साफ़ मांग रहे थे । उधर अशोक सम्राट् होते हुए भी अबोध बच्चों को उनके बाप , बेचारी विधवाओं के सुहाग , बूढ़ी माताओं को उनके बुढ़ापे का सहारा तथा बेसहारा बहनों को उनके प्यारे भाई लौटा कर उनके होठों की मुस्कराहट वापस लाने में असमर्थ था । उसने महसूस किया कि उसने इनसे बड़ा अन्याय किया और जो वह वापस नहीं दे सकता उसको उसे छीनने का भी कोई अधिकार नहीं था । अतः उसने गुनाहों का पश्चात्ताप करने का निश्चय किया । उसने युद्ध से तौबा की और अहिंसा का दामन थामा । इस प्रकार रणचण्डी का पुजारी अहिंसा का दूत बन गया । उसने विश्व को अहिंसा , शान्ति तथा विश्व – बन्धुत्व का सन्देश दिया । इस प्रकार अशोक , अशोक से अशोक महान् बना । इस महान् व्यक्ति की जीवन गाथा इस प्रकार है

अशोक का प्रारम्भिक जीवन ( Early Career of Ashoka )

अशोक मौर्य वंश का तीसरा और सबसे महान् राजा हुआ है । वह बिन्दुसार का पुत्र तथा चन्द्रगुप्त मौर्य का पौत्र था । उसकी जन्म तिथि के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता । परन्तु बहुत से इतिहासकार इस मत से सहमत हैं कि अशोक का जन्म 302 ई० पू० के लगभग हुआ । डॉ० आर० के० मुकर्जी ( Dr . R . K . Mookerji ) के अनुसार अशोक की माता सुभद्रांगी ( Subhadrangi ) एक ब्राह्मण की लड़की थी , परन्तु दक्षिण भारत की परस्परा के अनुसार अशोक एक क्षत्रिय स्त्री धर्मा ( Dharma ) का पुत्र था ।

कलिंग युद्ध

बाल्यकाल ( Childhood )

अशोक के बाल्यकाल के सम्बन्ध में विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं , यह अवश्य कहा जाता है कि वह बाल्यकाल से ही अपने दूसरे भाइयों से चतुर था । बड़ा हुआ तो उसकी तीक्ष्ण बुद्धि तथा चतुराई को देखते हुए उसके पिता ने उसे उज्जैन का गवर्नर ( कुमार ) नियुक्त कर दिया था । इसके पश्चात् तक्षशिला में विद्रोह होने पर उसे समाप्त करने के लिए अशोक को वहां भेजा गया । उसने वहां पहुंचकर विद्रोह को समाप्त कर दिया और उसे तक्षशिला का गवर्नर ही नियुक्त कर दिया गया ।

विवाह तथा सन्तान ( Marriage and Children )

अशोक ने कई विवाह करवाए थे । अशोक के अपने अभिलेख तथा महावंश से पता चलता है कि देवी , कारुवाकी , असन्धिमत्ता ( Asandhimitta ) और पद्मावती उसकी पत्नियां थीं । उसके चार पुत्र तथा दो पुत्रियां थीं । पुत्र महेन्द्र , कुणाल , जलोक और तीवार थे । वे चारों हो विभिन्न प्रांतों के राज्यपाल थे । उसकी पुत्रियों का नाम संघमित्रा और ‘ चारुमति ’ था ।

सिहासनारूढ़ होना ( His Accession )

लंका की बौद्ध परम्पराओं और दूसरे ग्रन्थों से पता चलता है कि बिन्दुसार की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्रों में सत्ता प्राप्ति के लिए गृह युद्ध प्रारम्भ हो गया था । इन्हीं परम्पराओं के अनुसार अशोक ने अपने भाई । सुसीमा को हरा दिया था और अपने दूसरे 99 भाइयों की हत्या कर दी थी । बिन्दुसार का निधन 273 ई० पू० में हुआ था , परन्तु अशोक का राज्याभिषेक चार वर्ष के पश्चात् 269 ई० पू० में होता है । डॉ० स्मिथ का कहना है कि हो सकता है कि चार वर्ष अशोक को सत्ता प्राप्ति के प्रयत्न करते बीत गए हों । डॉ० मुकर्जी का विचार है कि हो सकता है कि बौद्धों की यह 99 भाइयों की हत्या की कहानी कपोलकल्पित हो और केवल यह बताने के लिए घढ़ी हो कि बौद्ध धर्म धारण करने से पूर्व अशोक कितना अत्याचारी तथा निर्मम था और बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात् वह कितना सुहृदय और सहनशील बन गया था ।

इसके अतिरिक्त उपरोक्त कहानी पर इसलिए भी विश्वास नहीं होता कि अशोक के शिलालेखों से यह ज्ञात होता है कि उसके शासनकाल के 20 वर्ष पश्चात् भी उसके भाई – बहिन पाटलं पुत्र अादि में रहते थे । डॉ० जायसवाल का विचार है कि अशोक इसलिये चार वर्ष तक सिंहासन पर नहीं बैठा क्योंकि बिन्दुसार की मृत्यु के समय उसकी आयु 21 वर्ष थी जबकि सिंहासन पर बैठने के लिए 25 वर्ष का होना आवश्यक था , परन्तु डॉ० राय चौधरी ने इन विचारों का खण्डन किया है कि सिंहासन पर बैठने के लिये 25 वर्ष की आयु अावश्यक थी । उन्होंने अपने विचार के समर्थन में पुराणों से प्रसंग उद्धत किए हैं । कुछ भी हो , अशोक के सिंहासन पर बैठने के समय के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता । सिंहासन पर बैठने के पश्चात् शीघ्र ही उसने ” प्रियदर्शी ” और ” देवानां प्रियः ” की उपाधियां धारण कर ली थीं ।

उसके निजी जीवन के सम्बन्ध में हमारे पास कोई जानकारी नहीं परन्तु परम्पराओं से पता चलता है कि अशोक पहले बहुत विलासी तथा क्रोधी स्वभाव का था । कलिंग की लड़ाई से पूर्व उसे शिकार का बहुत शौक था । वह मांस भी खाता था और अधिकांश समय भोग – विलास में डूबा रहता था । उस समय वह शिव का भी पुजारी था । कलिंग युद्ध के पश्चात उसके जीवन में काफी परिवर्तन आया ।

इस तरह अशोक का प्रारम्भिक जीवन बीता |

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