Thursday , 23 May 2019
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महात्मा बुद्ध की शिक्षा

महात्मा बुद्ध की शिक्षा के मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित हैं : –

चार आदर्श और अष्टमार्ग ( Four noble Truths and noble Eight old Path )

महात्मा बुद्ध की शिक्षा के चार प्रदर्श सिद्धान्त हैं :-

  1. संसार दुःखों और कष्टों का घर है । डॉ० राधा कृष्णन् ने अपनी पुस्तक ‘ Indian Philosophy ‘ में लिखा है , ” Birth is pain ful , decay is painful , disease is painful , death is painfu , union with the unpleasant is painful , painful is the separation from the pleasant , and craving that is unsatisfied that too painful . “
  2. इन कष्टों और दुःखों का कारण विभिन्न जातियां , इच्छाएं तथा वासनाएं हैं । जिस समय एक इच्छा पूरी हो जाती है तो उसके स्थान पर दूसरी उत्पन्न हो जाती है । जिस इच्छा की पूर्ति नहीं होती उससे मन को दुःख होता है ।
  3. इन वासनाओं और इच्छाओं को जीत कर मनुष्य अपने दुःख दूर कर सकता है । यदि बीज नहीं होगा तो वृक्ष कैसे पैदा होगा ।
  4. वासनाओं और इच्छाओं पर विजय पाने के लिए अष्टमार्ग पर चलने की आवश्यकता है ।

अष्ट – मार्ग के निम्नलिखित आठ सिद्धान्त हैं :-

  1. शुद्ध विचार ( Right Thought ) 2 . शुद्ध आचरण ( Right Action ) 3 . शुद्ध दृष्टि ( Right Views ) 4 . शुद्ध वचन ( Right Speech ) 5 . शुद्ध यत्न ( Right Efforts ) 6 . शुद्ध जीवन ( Right Living ) 7 . शुद्ध समाधि ( Right Meditation ) 8 . शुद्ध स्मृति ( Right Mindfulness )

मध्य मार्ग ( Middle Path )

उपरोक्त अष्ट – मार्ग को मध्य – मार्ग भी कहा जाता है क्योंकि उसमें हिन्दुओं की कुरीतियों तथा भोग – विलासितापूर्ण जीवन नहीं है और न ही जैनियों का घोर तपस्या वाला जीवन है , जिसमें जीवन के अन्त होने का भी भय रहता है । महात्मा बुद्ध ने तो मध्य मार्ग चुना । अतः इसे मध्य – मार्ग का नाम दिया गया है ।

अहिंसा ( Non – Violence )

अहिंसा बौद्ध मत का मुख्य सिद्धान्त है । बुद्ध भी स्वामी महावीर के समान अहिंसा के पुजारी थे । किसी जीव की हत्या तो एक ओर वह जीव को सताना तक बुरा समझते थे । उन्होंने मांस खाने की भी निन्दा की है । परन्तु जैनियों के समान वे छोटे – छोटे कीटाणुओं की रक्षा के लिए मुंह पर पट्टी बांधने तथा पैरों से नंगा चलने की शिक्षा नहीं देते थे । वह इसलिए कि संसार में इस प्रकार अगिनत कीटाणु हैं जो मनुष्य के उठने बैठने तथा चलने से स्वयं मर जाते हैं । बुद्ध ने बताया कि मनुष्य को प्रत्येक जीव से प्रेम करना चाहिए । इसका अहिंसा का सिद्धान्त व्यावहारिक ( Practical ) था ।

ईश्वर के सम्बन्ध में मौन ( Silence over the Existence of God ) – महात्मा बुद्ध की शिक्षा

महात्मा बुद्ध ईश्वर के सम्बन्ध में एकदम मौन थे । वे हिन्दू धर्म की भान्ति ईश्वर के इस झगड़े में पड़ कर अपने धर्म को और पेचीदा नहीं बनाना चाहते थे । वैसे भी ईश्वर है या नहीं , यदि है तो कहां रहता है आदि प्रश्नों के उत्तर में बहुत वाद – विवाद की आवश्यकता है , जिससे महात्मा बुद्ध बचना चाहते थे । दूसरे शब्दों में जैसे एन . एन . घोष ( N . N . Ghosh ) ने लिखा है , ” बुद्ध ने पूरी तरह ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार भी नहीं किया , परन्तु मुक्ति की प्राप्ति के लिए ईश्वर की आवश्यकता भी अनिवार्य नहीं बताई । ‘

कर्म सिद्धान्त तथा पुनर्जन्म सिद्धान्त ( Karma theory and Rebirth theory )

महात्मा बुद्ध कर्म – सिद्धान्त में विश्वास रखते थे । उनका विचार था कि जैसा कोई कर्म करता है , उसका फल उसे वैसा ही मिलता है । जैसे पूर्व जन्म के कर्मों का फल हमें इस जन्म में मिला और इस जन्म के कर्मों का फल हमें अगले जन्म में मिलेगा । इस प्रकार कोई भी मनुष्य कमों के फल से नहीं बच सकता । वह अपना भाग्य निर्माता स्वयं है ।

मोक्ष या निर्वाण ( The Nirvana )

महात्मा बुद्ध के अनुसार जीवन का प्रमुख उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना ही है । उन्होंने मृत्यु के पश्चात् अन्तिम उद्देश्य स्वर्ग नहीं निर्धारित किया क्योंकि वह नरक तथा स्वर्ग की गहरी बातों में नहीं उलझना चाहते थे । उन्होंने बताया है कि कोई भी मनुष्य चाहे वह ब्राह्मण हो या शूद्र , शुद्ध जीवन व्यतीत करने पर निर्वाण प्राप्त कर सकता है । वह जीवन – मरण के चक्कर से मुक्ति प्राप्त कर लेता है ।

यज्ञ , बलिदान तथा कर्मकाण्ड में अविश्वास ( No faith in Yajna , Sacrifice and Ritualism )

जैनियों के समान महात्मा बुद्ध भी यज्ञों , बाह्याडम्बरों , पशु – बलियों तथा कर्मकाण्डों में विश्वास नहीं रखते थे । उनको ब्राह्मणों तथा वेदों की महत्ता और पवित्रता पर भी विश्वास नहीं था । वे इस प्रकार के दिखावे को मुक्ति के लिए आवश्यक नहीं मानते थे , अतः उन्होंने इनका विरोध किया है ।

वेदों में अविश्वास ( No Faith in Vedas )

तत्कालीन सामान्य जनता संस्कृत से अनभिज्ञ थी , अतः उनके लिए वेदों को पढ़ना तथा समझना पर्याप्त कठिन था । इनको समझने के लिए उन्हें ब्राह्मणों की शरण में जाना पड़ता था , परन्तु ब्राह्मण स्वार्थी थे और वे वेदों का अर्थ अपने व्यक्तिगत हित के अनुसार ही निकाल लेते थे । अतः महात्मा बुद्ध ने वेद पढ़ने पर कोई विशेष बल नहीं दिया था । वे वेदों को ईश्वर रचना नहीं मानते थे और न ही उनको अनादि मानते थे ।

हीनयान और महायान में अंतर

जाति – पाति में अविश्वास ( No Faith in Caste System )

जैन धर्म के समान महात्मा बुद्ध ने भी जाति – पाति का विरोध किया । उनके लिए सभी मनुष्य समान थे । कोई मनुष्य अपनी जाति के कारण छोटा अथवा बड़ा नहीं हो सकता था । कर्मा तथा गुणों से ही मनुष्य छोटा अथवा बड़ा हो सकता है , पर जाति – पाति के आधार पर नहीं । बौद्ध धर्म में ऊंच – नीच का कोई भेदभाव नहीं था ।

सदाचार पर बल ( Emphasis on Morality )

महात्मा बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं में सदाचार पर बहुत बल दिया । उनके अनुसार सत्य बोलना , चोरी तथा बुरे कमों से दूर रहना , लालच न करना , जीवों पर दया करना , दूसरों की निन्दा न करना , अहिंसा का पालन करना , सुगन्धित वस्तुओं का प्रयोग न करना , नाच – गानों का त्याग करना , राजपाट का त्याग करना , गुदगुदे बिस्तर का त्याग करना अति आवश्यक है । इन्हीं गुणों से मनुष्य सदाचारी बन सकता है ।

भ्रातृत्व ( Brotherhood )

महात्मा बुद्ध ने भ्रातृत्व के सिद्धांत का भी लोगों में बहुत प्रचार किया । उन्होंने बताया कि सभी लोगों को परस्पर भाइयों की तरह मिलजुल कर रहना चाहिए । उन्होंने उपदेश दिया कि सभी आपसी लड़ाई – झगड़े समाप्त कर हमें प्रेम – पूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहिए ।

घोर तपस्या में अविश्वास ( Disbelief in Hard Penance )

महात्मा बुद्ध ने चाहे स्वयं घने वनों में तपस्या की परन्तु अपने अनुयायियों को इस प्रकार करने से रोका । उन्होंने बताया कि बिना तपस्या किए अष्ट मार्ग पर चल कर संसार में निवास करते हुए भी मुक्ति की प्राप्ति हो सकती है ।

संस्कृत भाषा की पवित्रता में अविश्वास ( No faith in the sanctity of Sanskrit Language )

महात्मा बुद्ध को संस्कृत भाषा की पवित्रता में विश्वास नहीं था । उस समय यह विचार किया जाता था कि संस्कृत भाषा में धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन से फल मिलता है । परन्तु महात्मा बुद्ध ने इन विचारों का विरोध किया । उन्होंने बताया कि प्रत्येक भाषा पवित्र है ।

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