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गुप्त वंश की जानकारी के मुख्य स्रोत

गुप्त वंश की जानकारी

लगभग 125 वर्ष के इतिहास के अज्ञात – काल के पश्चात् गुप्त वंश ने फिर भारत में एक स्थायी साम्राज्य स्थापित किया था । इस वंश के इतिहास को जानने के लिए हमारे पास निम्नलिखित मुख्य स्रोत हैं :-

चीनी यात्री फाह्यान का वृत्तान्त ( Fahien’s account )

चीनी यात्री फाह्यान 405 – 411 ई० में भारत में आया था । वह यहां पर 6 – 7 वर्ष रहा । उसने गुप्त साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र , वहां की शासन – व्यवस्था तथा उस समय की धार्मिक , आर्थिक , सांस्कृतिक और सामाजिक अवस्थाओं के विषय में लिखा है । फाह्यान की भारत यात्रा का मुख्य उद्देश्य बौद्ध तीर्थ – स्थानों की यात्रा और बौद्ध साहित्य का अध्ययन था , पर गुप्त राज्य के विषय में इसके लेख ज्ञान का मुख्य स्रोत हैं , उसने भारत में जो कुछ भी देखा है , उसका यथातथ्य वर्णन करने का प्रयत्न किया है ।

इलाहाबाद का स्तम्भ लेख ( The Allahabad Pillar Inscription )

यह शिलालेख इलाहाबाद के दुर्ग में अशोक के एक स्तम्भ पर लिखा हुआ है । इस को कवि हरिसेन ( Harisen ) ने लिखा था । इसमें हमें समुद्रगुप्त की नियुक्ति और उसकी उत्तर – दक्षिण विजय का पता चलता है । इस लेख के पता चलने से पहले समुद्रगुप्त के सम्बन्ध में इतिहासकारों को बहुत कम ज्ञान था ।

चन्द्रगुप्त मौर्य का चरित्र और उसके कार्य

महरौली में चन्द्र का लौह स्तम्भ ( The Iron Pillar of Chandra at Mehrauli )

दिल्ली के पास एक गांव महरौली में कुतुबमीनार के निकट एक लोहे का स्तम्भ ( लाट ) है , इस पर भी एक लेख लिखा है । यह हरिसेन के लेख से मिलता – जुलता है । इसके ऊपर लिखे हुए लेख में ‘ चन्द्र ‘ शब्द लिखा हुआ है , जिसका भाव इतिहासकार ‘ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ‘ समझते हैं क्योंकि चन्द्रगुप्त प्रथम ने तो दिल्ली का क्षेत्र जीता ही नहीं था । इस लेख से संकेत मिलता है कि ‘ चन्द्र ने बंगाल में पनप रहे कई विद्रोहो को दबाया था । उसने सिन्ध नदी की सब शाखाओं को पार किया था और वाह्नीक राजाओं को पराजित किया था । इस प्रकार महरौली का लौह – स्तम्भ हमें ‘ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ‘ के बारे में पर्याप्त ज्ञान प्रदान करता है ।

अन्य कई लेख ( Many other Inscriptions )

इसके अतिरिक्त बसर ( Basarh ) , सांची ( Sanchi ) , उदयगिरी ( Udayagiri ) और कई अन्य स्थानों पर इस प्रकार के लेख मिलते हैं , जिनसे हमें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के विषय में आवश्यक ज्ञान प्राप्त होता है । ‘ एरन शिलालेख ‘ ( Eran Inscription ) से भी समुद्रगुप्त के शासन प्रबन्ध के विषय में पर्याप्त ज्ञान मिलता है ।

सिक्के ( Coins )

गुप्त वंश के विषय में और अधिक परिचय में उनके सिक्कों से मिलता है । ये सिक्के न केवल गुप्त राजाओं की उपाधियां ही बताते हैं बल्कि उनके व्यक्तित्व पर भी बहुत अधिक प्रकाश डालते हैं जैसे कि एक सिक्के पर वीणा की छाप अंकित है और कइयों पर चौकी के ऊपर बैठे समुद्रगुप्त का वीणा बजाते हुए का चित्र है , जिससे यह सिद्ध होता है कि वह संगीत का बहुत प्रेमी था । फिर समुद्रगुप्त के कई सिक्कों पर धनुषधारी सैनिकों के चित्र मिलते हैं जो सिद्ध करते हैं कि जहां वह स्वयं एक योद्धा था , वहां बहादुरों का सम्मान भी करता था । सिक्कों पर विष्णु की मूर्ति उसके विष्णु का उपासक होने का प्रमाण देती है । शेष सिक्के गुप्त राजाओं की आर्थिक अवस्था पर प्रकाश डालते हैं । जिस प्रकार समुद्रगुप्त के समय के हमें बहुत से सोने के सिक्के मिलते हैं परन्तु कुमारगुप्त और स्कन्दगुप्त के समय के सोने के सिक्कों की संख्या बहुत कम मिलती है । राज्य विस्तार का भी इन्हीं सिक्कों से पता चलता है जैसे चन्द्रगुप्त ने शक जाति को पराजित करके उन्हीं जैसे चांदी के सिक्के प्रचलित किए थे । सिक्के उस समय की प्रचलित लिपि के बारे में भी प्रकाश डालते हैं ।

पुराण ( The Puranas )

यह ठीक है पुराणों में कई कपोल – कल्पनाएं हैं , परन्तु फिर भी इनसे इतिहासकारों ने इतिहास के निर्माण के लिए बहुत सहायता ली है । गुप्त वंश के विषय में विशेषकर ‘ वायु पुराण ‘ हमें महत्त्वपूर्ण ज्ञान देता है ।

साहित्य ( Literature )

गुप्त वंश में और उनके पश्चात् लिखे गए साहित्य से भी गुप्त वंश के बारे में कई महत्वपूर्ण बातों का ज्ञान प्राप्त होता है । कालिदास , विशाखदत्त आदि प्रसिद्ध नाटककारों और कवियों की रचनाएं गुप्त राजाओं के व्यक्तिगत जीवन , उस समय की राजनीतिक , आर्थिक और धार्मिक अवस्थाओं के बारे में पर्याप्त प्रकाश डालती हैं । कालिदास का ‘ शकुन्तलम् ‘ नाटक है । वजिक की रचना ” कौमुदी महोत्सव ” ( Kaumudi Mahotsava ) , विशाखदत्त की रचना ” देवीचन्द्र गुप्तम् ” , बाण का ‘ हर्षचरितम् ‘ , आर्य मंजु की ‘ श्री मुलकलत् ‘ और कामंदक का ‘ नीतिशास्त्र ‘ आदि भी गुप्त राजाओं के बारे में परिचय देते हैं ।

कला ( Art )

इस समय की बनी हुई मूर्तियां , मन्दिर , अजन्ता की गुफाओं में चित्रकारी और मूतिकला , महरौली के पास बने हुए स्तम्भ गुप्त काल में कला के विकास के सुन्दर उदाहरण पेश करते हैं । ।

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