Thursday , 18 July 2019
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हीनयान और महायान में अंतर

हीनयान और महायान में अंतर

महात्मा बुद्ध की मृत्यु के बाद बौद्ध भिक्षुओं ने बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों की व्याख्या अपनी इच्छानुसार करनी प्रारम्भ कर दी । इस प्रकार रीति – रिवाजों और संस्कारों का जन्म हुआ जिसका परिणाम यह हुआ कि कनिष्क के समय में इसके दो सम्प्रदाय हो गए । हीनयान बौद्ध धर्म के उस मूल रूप को मानते थे जो बौद्ध के अपने समय में था , परन्तु महायान वाले बौद्ध धर्म के सुधरे हुए रूप को मानते थे । इस परिवर्तन को बौद्ध धर्म का परिवर्तन ( Transformation of Buddhism ) भी कहा जाता है । हीनयान और महायान सम्प्रदायों में जो अंतर हैं वे निम्नलिखित हैं : –

मूर्ति पूजा ( Idol worship )

महात्मा बुद्ध मूर्ति पूजा के विरोधी थे परन्तु कालान्तर में महायान सम्प्रदाय ने बुद्ध को एक देवता मान कर उनकी मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी , परन्तु इसके विपरीत हीनयान वाले बुद्ध की मूर्तिपूजी के विरोधी थे । महायान वालों ने बुद्ध के अतिरिक्त कुछ अन्य मुख्य भिक्षुओं की मूर्तियां बना कर उनकी देवताओं के समान पूजा प्रारम्भ कर दी । यह हिन्दू धर्म का ही प्रभाव था ।

तर्क और श्रद्धा ( Reason and Faith )

हीनयान वाले किसी बात को मानने से पूर्व उसे तर्क ( Reason ) की कसौटी पर परखने के पक्ष में थे , परन्तु महायान वाले विश्वास और श्रद्धा पर अधिक बल देते थे ।

महात्मा बुद्ध की शिक्षा

पवित्र आचरण और अन्धविश्वास ( Good Moral and Blind Faith )

प्रारम्भ में बौद्ध धर्म शुभ आचरण और शुभ कर्म इन दोनों पर बहुत बल देता था । इस पर हीनयान वाले अब भी बल देते थे । परन्तु महायान वालों ने शुभ आचरण के स्थान पर अपने भिक्षु और गुरु की पूजा करनी प्रारम्भ कर दी । इनका विचार था कि जितनी महात्माओं की पूजा अधिक होगी उतने ही इनके पाप कम होंगे । इस प्रकार ये अन्धविश्वासी हो गए ।

पाली और संस्कृत भाषा ( Pali and Sanskrit Language )

हीनयान सम्प्रदाय अपना सारा साहित्य पाली जोकि जनसाधारण को बोलचाल की भाषी थी , में रचने के पक्ष में था । वह जनता की बोली को अपने साहित्य के लिए योग्य समझता था परन्तु इसके विपरीत महायान सम्प्रदाय संस्कृत को अपने साहित्य के प्रयोग में लाना चाहता था । उनका विचार था कि संस्कृत में काल और ध्वनियां पाली से कहीं अधिक हैं , वैसे भी संस्कृत उच्चकोटि की भाषा है ।

मुक्ति और स्वर्ग ( Nirvana and Heaven )

हीनयान सम्प्रदाय महात्मा बुद्ध के बनाए हुए मुक्ति के सिद्धान्त को मानते थे और महायान वाले स्वर्ग को ही मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य समझते थे ।

महायान वालों का विचार था कि उनके धर्म में अब पर्याप्त परिवर्तन आ चुका है और उनका धर्म हिन्दू धर्म के पर्याप्त निकट हो गया है इसलिए हिन्दू धर्म वाले इस धर्म की ओर आकृष्ट होंगे परन्तु हुआ इसके बिल्कुल विपरीत । बौद्ध महायान वाले ही हिन्दू धर्म में आ गए । इस प्रकार महायान हिन्दू धर्म के ही अन्दर मिल गया ।

फिर हर्षवर्धन जसे सम्राट् के समय हीनयान पर्याप्त शिथिल हो गया और बौद्ध धर्म की महायान शाखा अब भी शेष थी । इसका कारण यह है कि इसमें पूर्व हीनयान से अधिक विशेषताएं थीं ।

समयोपरान्त महायान हिन्दू धर्म में मिल गया , परन्तु हर्ष के राज्यकाल में हीनयान धर्म को तनिक भी प्रोत्साहन मिलता तो सम्भव था कि हिन्दू धर्म के साथ – साथ बौद्ध मत की हीनयान शाखा भी जीवित रहती क्योंकि हिन्दू धर्म और इसमें पर्याप्त अन्तर था ।

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