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चीनी यात्री फाह्यान तथा उसका भारत वर्णन

फाह्यान एक चीनी यात्री था जो भारत में बौद्ध मत के साहित्य का अध्ययन करने व बौद्ध तीर्थों की यात्रा करने के उद्देश्य से भारत में आया था । कहा जाता है कि उसके माता – पिता की मृत्यु छोटी आयु में ही हो गई थी ; इसलिए बड़ा होकर उसका मन सांसारिक कार्यों की ओर न लगा । वह भिक्षु बन गया । चीनी भाषा में ‘ फ ‘ का अर्थ ‘ धर्म ‘ व ‘ ह्यान ‘ का अर्थ ‘ आचार्य ‘ होता है । इस प्रकार ‘ फाह्यान ‘ का अर्थ ‘ धर्माचार्य ‘ ( Dharma Charya ) है ।

फाह्यान का भारत के लिए प्रस्थान , 399 ई० ( Fahien sets out for India )

फाह्यान विचारशील स्वभाव का था । भिक्षु बनने के पश्चात् उसने ‘ त्रिपिटक ‘ आदि बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन किया और इस परिणाम पर पहुंचा कि वह अभी अपूर्ण ही है , इसलिए बौद्ध धर्म का अध्ययन करने के लिए व उसके पवित्र धार्मिक स्थानों की यात्रा के लिए वह 399 ई० में चीन से भारत की ओर चल पड़ा । उन दिनों बौद्ध धर्म के पवित्र स्थानों की यात्रा करना बहुत पवित्र कार्य समझा जाता था , जिस प्रकार कि आज भी मुसलमानों में मक्के मदीने की यात्रा ‘ हज्ज ‘ को पवित्र समझा जाता है । यह भी कहा जाता है कि उसके चार साथी और भी थे जिनमें से दो रास्ते में ही मर गए । शेष दो अपने देश वापस चले गए ।

इस लम्बी यात्रा में फ़ाह्यान को 15 वर्ष लगे जिनमें से छः वर्ष 405 से 411 ई० तक वह भारत में ही रहा । भारत पहुंचने के लिए वह गोभी मरुस्थल ( Gobbi desert ) को पार करके खोतान , पामीर आदि भागों को पार करता हुआ पश्चिम की शवात ( Sawat ) घाटी में जा पहुंचा , फिर गांधार के रास्ते से पेशावर आ पहुंचा । यहां से तक्षशिला पहुंचा । भारत में उसने सभी बौद्ध तीर्थों की यात्रा की । वह सारनाथ , कुशीनगर , गया , राजगृह , पाटलिपुत्र , मथुरा , कन्नौज आदि स्थानों पर गया । जो कुछ उसने वहां पर देखा , उसको अपने पास लिख लिया । भारत में छः वर्ष रहने के पश्चात् वह लंका आदि की यात्रा करता हुआ जलमार्ग से अपने देश लौट गया ।

फ़ाह्यान का वृत्तान्त ( Fahien’s Description )

फ़ाह्यान ने उस समय की धार्मिक , राजनैतिक व सामाजिक दशा के बारे में लिखा है । यह इतिहासकारों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है और इसके वृत्तान्त का वर्णन निम्नलिखित है :-

पाटलिपुत्र ( Patliputra )

अशोक का राजमहल ( Ashoka’s Palace ) – पाटलिपुत्र गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी । यहां पर वह तीन वर्ष रहा । वह अशोक के अति सुन्दर महल को देख कर बहुत हैरान हुआ , अतः उसने लिखा है कि इतना सुन्दर व विशाल महल मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं किया जा सकता । यह अवश्य ही दैवी शक्ति द्वारा बनाया गया होगा । उसने लिखा है , ” देवतास्त्रों ने पत्थर एकत्रित किए और उनकी दीवारें व दरवाजे लगाए । उस पर पत्थर की नक्काशी का इतना सुन्दर काम किया कि विश्व का कोई मनुष्य नहीं कर सकता । ” |

दो सुन्दर मठ ( Two beautiful monasteries ) – फ़ाह्यान पाटलिपुत्र में तीन वर्ष तक रहा । उसने नगर का बहुत सुन्दर वर्णन किया है । उसने लिखा है कि यहां बौद्ध के दो शानदार और सुन्दर मठ थे , एक महायान वालों का और दूसरा हीनयान वालों का । इनमें 6 – 7 हजार भिक्षु रहते थे , जो बहुत विद्वान होते थे । वे भिक्षु बहुत पवित्र जीवन व्यतीत करते थे । उनसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारत के प्रत्येक भाग से लोग आते थे ।

बौद्धियों का जलूस ( Procession of Buddhists ) – फ़ाह्यान न लिखा है कि वर्ष के दूसरे मास के आठवें दिन महात्मा बुद्ध और बौद्ध मूर्तियों का शहर में बहुत ठाठ से जलूस निकाला जाता था । इन मूर्तियों को बहुत साज – सज्जा के साथ बीस बैल गाड़ियों में रखा जाता था । बौद्धियों के अतिरिक्त इसमें ब्राह्मण भी भाग लेते थे ।

धनी व दानी लोग ( Prosperous and Charitable People ) – पाटलिपुत्र के लोगों की आर्थिक दशा ने भी फाह्यान को बहुत प्रभावित किया था । उसने लिखा है कि वहाँ के लोग बहुत धनी एवं दानी थे । निर्धनों व दीन – दुःखियों की दवाई आदि के लिए मुफ्त अस्पताल खोला हुआ था । नगर में जगह – जगह यात्रियों के विश्राम के लिए धर्मशालाएं बनी हुई थीं ।

राजनीतिक दशा तथा राज्य – प्रबन्ध ( Political Condition and Administration )

फाह्यान ने चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज्य प्रबन्ध के बारे में निम्नलिखित बातें बताई हैं :-

लोककल्याणकारी राज्य ( Welfare State or Enlightened Character of the Govt . ) – फ़ाह्यान ने लिखा है कि सरकार बहुत ही जन हितैषी व नर्म थी । लोगों को प्रत्येक प्रकार की स्वतन्त्रता थी । सरकार की ओर से लोगों पर कोई अत्याचार नहीं किए जाते थे । सरकार लोगों के दैनिक जीवन में कोई हस्तक्षेप नहीं करती थी । प्रत्येक मनुष्य या स्त्री देश के हर भाग में घूम – फिर सकता था । फाह्यान ने लिखा है , ” लोग जहां चाहें जा और ठहर सकते थे । उनको किसी रजिस्टर पर नाम दर्ज करवाने और न्यायाधीश के पास जाने का कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ता था । ”

नर्म दंड ( Mild Punishments ) – फाह्यान ने लिखा है कि उस समय अपराधियों को साधारण व नर्म दंड दिए जाते थे । मृत्यु की सज़ाएं होती ही नहीं थीं । साधारण दोषों के लिए जुर्माना किया जाता था । बार – बार दोष करने वालों और विद्रोह करने वालों का दाया बाजू काट दिया जाता था परन्तु इस प्रकार के दोष आम नहीं होते थे बल्कि बहुत कम होते थे ।

सुरक्षित मार्ग ( Safe Highways ) – चोरी , डाके या लुटेरों का कोई भय नहीं था । सब मार्ग , सड़के पूरी तरह सुरक्षित थीं । फाह्यान स्वयं निडर होकर घूमता रहा । किसी ने भी उसको नहीं लूटा ।

ईमानदार कर्मचारी ( Honest Employees ) — सरकार की आय का मुख्य साधन भूमि – कर था जिसके लिए ईमानदार कर्मचारी रखे हुए थे । कर्मचारियों को नियत वेतन मिलते थे । वे बहुत ही ईमानदार थे और कोई रिश्वतखोरो नहीं थी ।

सामाजिक अवस्था ( Social Condition )

लोग समृद्ध थे । जनता को किसी वस्तु का अभाव नहीं था । सोना , चांदी प्रत्येक घर में पर्याप्त होता था । आर्थिक स्थिति अच्छी होने के कारण लोग पर्याप्त दान – पुण्य करते थे । वे पाप करने से डरते थे । मांस तथा शराब का प्रयोग नहीं होता था , यहां तक कि प्याज तथा लहसुन का भी प्रयोग नहीं किया जाता था । पशुओं का बेचना भी बुरा समझा जाता था । छुत – छात का रोग पर्याप्त मात्रा में व्याप्त था । निम्न जाति के लोगों को ‘ चण्डाल ‘ कहा जाता था । वे नगर के बाहर रहते थे और जब भी नगर में आते थे तो लकड़ी की चपटियों से अवाज़ कर अपने आगमन की सूचना देते थे । धनवानों ने जनता की भलाई के लिए अस्पताल खोल रखे थे । स्थान – स्थान पर धर्मशालाएं थीं । सोने चांदी के सिक्कों का प्रचलन था , परन्तु छोटी वस्तुओं के क्रय – विक्रय के लिए कौड़ियां प्रयुक्त की जाती थीं ।

धार्मिक स्थिति ( Religious Condition )

फाह्यान ने उस काल की धार्मिक स्थिति के सम्बन्ध में पर्याप्त प्रकाश डाला है । वह बौद्ध था ; इसलिए बौद्ध धर्म के सम्बन्ध में उसकी लिखी सामग्री उपलब्ध होती है । उसने लिखा है कि बौद्ध धर्म उन्नति के शिखर पर था । उसने मथुरा में 20 बौद्ध मठों के दर्शन किए । उस समय पंजाब , बंगाल तथा मथुरा में बौद्ध धर्म का बहुत प्रचार था । सरकार भी बौद्ध भिक्षुओं को वित्तीय सहायता देती थी । दूसरे धर्म वाले भी उनसे घृणा नहीं करते थे । फाह्यान ने हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में लिखा है कि मध्य भारत में हिन्दू धर्म का बहुत प्रभाव था क्योंकि उस प्रदेश में एक – दो ही बौद्ध मठ थे । उसके लेखों से यह भी प्रमाणित होता है कि उस समय बौद्ध धर्म का यौवन ढल रहा था क्योंकि सारनाथ , कपिलवस्तु तथा गया आदि बौद्ध तीर्थों का महत्त्व कम होता जा रहा था । हिन्दू धर्म उन्नति की ओर अग्रसर था । फाह्यान ने उस समय की सरकार के सम्बन्ध में , जो हिन्दू धर्म की अनुयायी थी , लिखा है कि वह धार्मिक सहिष्णुता की नीति पर चलती थी । बौद्ध तथा जैनियों का अपमान नहीं किया जाता था बल्कि उन्हें आर्थिक सहायता दी जाती थी ।

मालवा के सम्बन्ध में ( About Malwas )

चीनी यात्री पर मालवा के प्रशासन का विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर होता था । उसने इसकी जलवायु , यहां के लोगों तथा यहां की व्यवस्था की बहुत प्रशंसा की है । उसके अनुसार मालवा बहुत समृद्ध प्रदेश था । यहां की शासन – व्यवस्था अच्छी थी और लोग प्रसन्न थे ।

भारतीय जहाजरानी तथा विदेशों से सम्बन्ध ( Indian Shipping and Overseas Relations )

भारतीय व्यापार के विषय में भी हमें फाह्यान से बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है । उसने लिखा है कि देश में तथा विदेश से व्यापार जल तथा थल दोनों मार्गों से होता था । चीन , यूरोप तथा पूर्वी द्वीपसमूह से विस्तृत स्तर पर व्यापार होता था । इस उद्देश्य के लिए सरकार के पास लकड़ी के जलपोत ( Ships ) थे । इनके लिए भी बन्दरगाहें बनी हुई थीं जैसे सुपारा ( Supara ) , भड़ौच ( Broach ) और कैम्बे ( Canbay ) , आदि । इन बन्दरगाहों के द्वारा ही माल का आयात निर्यात होता था । बन्दरगाहें सारा वर्ष ही चलती रहती थीं ।

फाह्यान के उपरोक्त वृत्तान्त का ऐतिहासिक महत्त्व बहुत है । यद्यपि उसके लिखने का उद्देश्य और था , परन्तु इस वृत्तान्त में भारत के तत्कालीन सामाजिक , धार्मिक , आथिक और सांस्कृतिक प्रत्येक पक्ष पर प्रकाश डाला गया है ।

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