Friday , 24 May 2019
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नैपोलियन तृतीय का व्यक्तित्व एवं कार्यों का मुल्यांकन

नैपोलियन तृतीय का व्यक्तित्व एवं कार्यों का मुल्यांकन :-

नैपोलियन तृतीय के चरित्र एवं व्यक्तित्व में इतनी विभिन्नतायें हैं कि विद्वान भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके हैं । कुछ ने उसे ” Imperial Sphinx ” कहा है और कुछ उसे एक रहस्यमय पहेली मानते हैं । उसके अवगुणों को देखकर प्रसिद्ध उपन्यासकार विक्टर ह्यूगो ( Victor Hugo ) ने उसे “ Napoleon the Little ” कहा है । एक फ्राँसीसी इतिहासकार के अनुसार नैपोलियन तृतीय के एक ओर तो मेकेवली ( Machiaveli ) और दूसरी ओर डान कुइग्जोट ( Don Quixolte ) था । उसके सम्बन्ध में इतनी भिन्नताएँ देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि इतिहासकार नैपोलियन के साथ न्याय करने में असमर्थ रहे हैं ।

वास्तव में उसकी सफलता का मुख्य कारण उसके द्वारा अपने चाचा नैपोलियन प्रथम की नीतियों को अपनाना था । परन्तु उसमें नैपोलियन प्रथम के गुणों का अभाव था । वह स्वयं निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी था । अपनी बढ़ती हुई इच्छाओं को पूर्ण करने की न तो उसमें योग्यता थी और न ही वह उसके साधनों को जानता था । वह शान्ति के साथ कीर्ति का और राष्ट्रीयता के साथ रूढ़िवाद का समर्थन था । इटली में एक ओर उसने आन्दोलन को प्रोत्साहन दिया ; दूसरी ओर भयभीत होकर उसके विरुद्ध पाप को सहायता दी । उसकी गृह नीति भी इस प्रकार की थी कि उदारवादियों तथा रूढ़िवादियों में सदा वैमनस्य बना रहा । उसकी इस नीति से फ्रांस के अन्तर्राष्ट्रीय गौरव को भारी आघात पहुँचा । वह अपनी बाह्य नीति में फ्रांस के गौरव को ऊँचा उठाना चाहता था इसीलिए लगभग सभी देशों के मामलों में उसने हस्तक्षेप किया । इसीलिए उसकी बाह्य नीति ” Meddle and Muddle “ की नीति कहलाती है ।

नैपोलियन तृतीय अपने मिथ्या गौरव से फ्रॉस की जनता को प्रभावित करना चाहता था , परन्तु उसका ढोंग अधिक समय तक न चल सका । उसकी प्रजा उसके शासन से ऊब चुकी थी । यदि 1870 में सीडन के युद्ध में वह प्रशा द्वारा बन्दी न बना लिया जाता तो उसके पतन में कोई देरी न थी । 1870 में सीडन के युद्ध में ” होनहार भावी प्रबल रोकि सके न कोय “ वाली बात सत्य सिद्ध कर दी और उसके साम्राज्य का जो गणतंत्र , का समर्थक होने के बहाने प्राप्त किया था , अन्त हो गया । उसी साम्राज्य के विषय में तेयर ने एक बार कहा था कि साम्राज्य एक ऐसा वृक्ष है जिसकी जड़े नहीं हैं ।

इतना होते हुए भी उसके विषय में दो मत हैं । उसकी प्रशंसा करते हुए महारानी विक्टोरिया कहा करती थीं कि उसमें बहुत दयालुता थी और वह काफी आत्मनियन्त्रण कर सकता था . . . उसने सभी गलत कार्य इसलिए किये क्योंकि वह अनुभव करता था कि वह परमात्मा के कार्य को पूरा करने के लिए भूमि पर आया है . . . ।

नैपोलियन तृतीय के चरित्र में प्रतिकूलता पाई जाती थी । जो लोग उसे राजनीतिज्ञ कहते हैं , वे उसे महामूर्ख कहते हैं , क्योंकि उनका कथन है-

” He dazzled France and puzzled Europe . “

वास्तव में उसे आलोचक लोग ठीक प्रकार से न समझ सके । वह एक षडयंत्रकारी शासक था और अपने स्वार्थ के लिए उसे उचित – अनुचित का विचार नहीं रहता था । उसने शासन सत्ता पाते ही उद्घोषणा की थी कि नैपोलियन का नाम अपने आप में एक कार्यक्रम है ।

ऐसी घोषणाओं ने उसे अपने प्रभाव को फ्राँस तथा यूरोप में फैलाने में विशेष योग दिया , परन्तु अन्त में अपनी ही भूलों के कारण उसे पराजय और पतन का मुख देखना पड़ा ।

नैपोलियन तृतीय अपने चाचा की भाँति विजयों द्वारा फ्राँसीसियों के गर्व और अभिमान की भावनाओं को सन्तुष्ट करना चाहता था । प्रारम्भ में उसे सम्मान पूर्ण विजय प्राप्त होती रहीं परन्तु अन्त में 1860 से उसका पतन प्रारम्भ हो गया ।

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