Thursday , 18 July 2019
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शेरशाह सूरी की मारवाड़ पर विजय

मारवाड़ की विजय , 1543 – 44 ई० ( Conquest of Marwar )

मारवाड़ के राजपूत राजा मालदेव ( Maldev ) ने 1541 ई० में पराजित हुमायू को पुनः भारत विजय के लिए आमंत्रित किया था । शेरशाह ने मालदेव को हुमायू की सहायता करने से रोक दिया था । मालदेव ने फिर दोनों के भय से कोई ऐसा पग नहीं उठाया जिससे दोनों में से कोई रुष्ट हो , परन्तु शेर खां फिर भी मालवा के विरुद्ध था । वह इतनी बड़ी राजपूत रियासत को सहन नहीं कर सकता था , इसलिए उसने अच्छी तरह तैयारी करके 1543 ई० के अन्त में मारवाड़ की राजधानी जोधपुर ( Jodhpur ) पर आक्रमण कर दिया । राजपूतों ने डट कर सामना किया । शेर खां के सभी प्रयत्न विफल रहे तो उसने चालाकी से काम लिया । एक नकली पत्र मालदेव के तम्बू के निकट फिकवा दिया जिस में राजपूत सरदारों की ओर से शेरशाह को विश्वास दिलाया गया था कि वह अपने राजा को पकड़ कर शेरशाह के सुपुर्द कर देंगे ।

शेरशाह सूरी की अन्य विजये

यह देख कर मालदेव भाग गया , परन्तु उसकी सेना फिर भी लड़ती रही । राजपूतों ने ऐसा ज़ोरदार धावा बोला कि एक बार तो शेरशाह की प्राण – रक्षा भी भारी कठिनाई में पड़ गई थी । उसने कहा था , ” एक मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं भारत का साम्राज्य गंवाने लगा था । “ आखिर में विजय शेरशाह की ही हुई । इसके पश्चात् शेरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया जहां उस समय राणा संग्राम सिंह का अवयस्क पुत्र उदय सिंह राज्य करता था । उसने युद्ध किये बिना ही चित्तौड़ का दुर्ग शेरशाह के हवाले कर दिया । इस प्रकार शेरशाह उस समय राजपूताने के चार किलों अजमेर , जोधपुर , माउंट आबू और चित्तौड़ को अपने अधीन करके वापस लौटा था ।

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