Wednesday , 24 July 2019
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मुहम्मद तुगलक की कल्पित योजनाएं

गयासुद्दीन की मुत्यु के पश्चात् 1325 ई० में उसका पुत्र जूना खां सिंहासन पर बैठा । उसने मुहम्मद की उपाधि ग्रहण की । इतिहास में उसे मुहम्मद तुगलक के नाम से जाना जाता है । मुहम्मद तुगलक का इतिहास में विशेष स्थान है । वह बहुत विद्वान् , दानी , कवि तथा नई योजनाएं बनाने में सिद्धहस्त था । परन्तु उसके पास सामान्य जीवन का तजुरबा कम था ; इसलिए कई इतिहासकार उसे इंग्लैंड के जेम्ज प्रथम की भांति शिक्षित मूर्ख ( Wisest Fool ) कहते हैं । इतिहास में वह एक पहेली बना हुआ है और उसने जो कुछ किया है , उससे यह नहीं कहा जा सकता कि वह ठीक है या गलत । उस में मुख्य दुर्गण यह था कि वह जो योजनाएं बनाता था , उन्हें बहुत ही शीघ्रता से कार्यान्वित करने का आदेश देता था और यदि पूर्ण न होती तो मुहम्मद क्रोधित होकर उन लोगों पर कड़ाई करता जो उन योजनाओं की पूर्ति में लगे होते थे । उसकी योजनाएं बुरी न थीं , परन्तु उन्हें व्यावहारिक रूप देने में सुलतान कुछ भूले कर बैठा जिनके कारण वे असफल रहीं थीं :—

राजधानी परिवर्तन ( Transfer of Capital , 1327 – 29 ) – मुहम्मद तुगलक की कल्पित योजनाएं

मुहम्मद तुगलक ने 1327 ई० में दिल्ली की अपेक्षा दक्षिण देवगिरि ( Devgiri ) को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय किया । इस परिवर्तन के कई कारण थे । प्रथम कारण तो यह था कि देवगिरि उसके साम्राज्य के मध्य में थी । सभी मुख्य नगर दिल्ली , गुजरात , लखनौती आदि देवगिरि से एक सी दूरी पर थे । इस तरह देवगिरि जैसे स्थान से सारे साम्राज्य का काम भली – भांति चलाया जा तकता था । दूसरा कारण यह भी बताया जाता है कि देवगिरि उत्तर – पश्चिमी सीमा से दूर थी और मंगोलों के आक्रमणों से बच सकती थी । तीसरा कारण यह था कि सुलतान देवगिरि को राजधानी बना कर दक्षिणी प्रदेशों पर स्थायी रूप से राज्य करना चाहता था । यह भी कहा जा सकता है कि दक्षिण के धनी प्रदेशों के साधनों को अपने शेष साम्राज्य की प्रगति के लिए प्रयोग में लाना चाहता था । उपरोक्त कारणों से 1327 ई० में सभी सरकारी कर्मचारियों को देवगिरि जाने का आदेश मिल गया । वहां सभी सरकारी कार्यालयों का प्रबन्ध किया गया और देवगिरि का नाम दौलताबाद ( Daultabad ) रखा गया । यहां तक तो ठीक था । सुलतान ने दिल्ली की सारी जनसंख्या को भी सारी सम्पत्ति सहित दौलताबाद जाने का आदेश दिया । जनता के लिए ऐसा करना बहुत कठिन था । जब जनता ने आदेश का पालन करने में कुछ आनाकानी की तो सुलतान को बहुत क्रोध आया । उसने और भी कड़ा आदेश दे दिया कि किसी को भी दिल्ली न रहने दिया जाए ।

लोगों को आदेश – पालन के लिए 700 मील की यात्रा करनी पड़ी । थकावट तथा यात्रा की कठिनाइयों के कारण अगणित लोग मर गए । कइयों ने तो देवगिरि पहुंच कर दिल्ली छूटने के दुःख में ही प्राण त्याग दिए ।

परन्तु मुहम्मद के लिए देवगिरि में बैठ कर इतने विशाल साम्राज्य पर शासन करना कठिन था । देवगिरि दूर दक्षिण में होने के कारण उत्तर भारत में अव्यवस्था फैल गई । मंगोलों ने भी अपने आक्रमण जारी रखे । आखिर में सुलतान ने पुन : दिल्ली लौटने का निर्णय कर लिया । दिल्ली लौटने का आदेश सभी कर्मचारियों के साथ – साथ सारी जनता को भी दिया गया था । लोगों ने पुनः 700 मील की यात्रा की । उन्हें बहुत कष्ट सहन करने पड़े । दोबारा अगणित व्यक्ति मार्ग में ही मर गए ।

सुलतान का राजधानीपरिवर्तन का परीक्षण विफल रहा । उसकी मूर्खता के कारण धन की बरबादी के साथ – साथ अगणित लोग भी मृत्यु का ग्रास बन गए । राजधानी परिवर्तन की योजना उसकी एक भूल मानी जाती है । उसने यह न सोचा कि उसके साम्राज्य को सदा उत्तर की ओर से ही खतरा रहा है । कई आलोचकों ने मुहम्मद की इस भूल को आवश्यकता से अधिक बुरा कहा है , परन्तु ध्यानपूर्वक देखा जाए तो मुहम्मद एक योग्य प्रशासक था । उसने अपने राज्य के कल्याण के लिए ही राजधानी परिवर्तित की थी । यह लोगों का दोष था कि उन्होंने सुलतान के इस परिवर्तन की निन्दा आरम्भ कर दी और सुलतान ने क्रोध में आकर जनसाधारण को भी दिल्ली छोड़ने का आदेश दे दिया , परन्तु जब उसने योजना सफल होती न देखी तो तुरन्त दिल्ली लौटने का आदेश दे दिया ।

दोआब में लगान वृद्धि ( Increasing the Taxes in Doab ) – मुहम्मद तुगलक की कल्पित योजनाएं

मुहम्मद तुगलक के मस्तिष्क में कई योजनाएं बनती थीं । उन्हें कार्यान्वित करने के लिए उसे धन की आवश्यकता थी । वह अपनी सैनिक शक्ति में भी वृद्धि करना चाहता था । इसके लिए भी धन की बहुत आवश्यकता थी ; इसलिए उसने दोआब में भूमिकर बढ़ा दिया । दोआब काफ़ी उर्वर क्षेत्र था । बरनी ( Barni ) के अनुसार तो कर में 10 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि की गई थी । दुर्भाग्यवश उस वर्ष फ़सल न हुई और अकाल पड़ गया । दोआब के किसानों के लिए कर देना कठिन हो गया । सरकारी कर्मचारियों ने कड़ाई की जिससे डर कर बहुत से किसान वनों में भाग गए । सुलतान को यह देखकर बहुत क्रोध आया । उसने किसानों के नरसंहार का आदेश दे दिया । किसानों को वनों में ढूंढ – ढूंढ कर मारा गया । फसलें नष्ट हो गई । जब उनकी देख – रेख करने वाला कोई न रहा तो सुलतान को होश आया । उसने फिर अकाल पीड़ित लोगों की सहायता की । किसानों को ऋण भी दिए गए । कुएं खुदवाए गए , परन्तु लोग पुनः प्रसन्न न हुए और न ही पुनः समृद्धि आई ।

तांबे के सिक्कों का परीक्षण ( Experiment in Copper Currency ) – मुहम्मद तुगलक की कल्पित योजनाएं

थॉमस ( Thomas ) जो सिक्कों का प्रसिद्ध विशेषज्ञ है , ने मुहम्मद तुगलक को ‘ मुद्रा  निर्माताओं का राजा कहा है । ‘ उसने अपने शासनकाल में सिक्कों का सुधार भी बहुत किया था , परन्तु राजधानी परिवर्तन में उसका बहुत खर्च हो गया था ; इसलिए उसे , धन की आवश्यकता थी । इस कमी की पूर्ति के लिए उसने सोने – चांदी के स्थान पर उसी मूल्य के तांबे के सिक्के जारी किए । यह योजना 1329 – 30 ई० में लागू हो गई थी । इस योजना में एक कमी यह थी कि उस समय सरकार के पास सिक्के बनाने की मशीन नहीं थी ; इसलिए लोगों ने भी तांबे के नकली सिक्कों का निर्माण आरम्भ कर दिया क्योंकि तांबा तो आम मिलता था ।

प्रान्तों के गवर्नरों ने भी वार्षिक – कर नकली तांबे के सिक्कों में देना आरम्भ कर दिया । भूमि – कर भी नकली सिक्कों में आना आरम्भ हो गया । विदेशी व्यापारियों ने इस तरह के सिक्के लेने से इन्कार कर दिया जिस कारण व्यापार की भी भारी क्षति हुई । यह देखकर सुलतान को तांबे के सिक्के बन्द करने पड़े । लोगों को तांबे के सिक्के के स्थान पर सरकार की ओर से चांदी के सिक्के मिले । लोगों ने अधिक से अधिक नकली सिक्के बनाकर उसके बदले सोने – चाँदी के सिक्के प्राप्त किए । शाही महल के बाहर नकली सिक्कों के ढेर लगे हुए थे । मुहम्मद तुगलक की यह योजना भी विफल रही । उसका खजाना भरने की अपेक्षा और खाली हो गया । सरकार को बहुत क्षति हुई । लोग मुहम्मद तुगलक को मूर्ख समझने लगे , परन्तु यदि ध्यान से देखा जाए तो तुगलक की यह योजना बुरी नहीं थी । उस समय के लोगों ने सुलतान का साथ न दिया । सुलतान को सरकारी टकसाल का निर्माण करके तांबे के सिक्के चालू करने चाहिए थे ।

मंगोलों को धन देना ( Buying of the Mangols )

मंगोल सदा ही दिल्ली के सुलतानों के लिए सिरदर्दी का कारण बने रहे । जब तक बलबन और अलाऊद्दीन जैसे शक्तिशाली सुलतान दिल्ली में राज्य करते रहे , मंगोलों ने आक्रमण कम कर दिये , परन्तु जब कोई कमज़ोर सुलतान तख्त पर बैठता तो उनके आक्रमण तीव्र हो जाते थे । इसी तरह मुहम्मद तुगलक के शासन काल में हुआ । 1328 – 29 ई० में तारमशीरों के नेतृत्व में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण कर दिया वे पंजाब को लूटते हुए दिल्ली तक आ पहुचे । मुहम्मद तुगलक ने उनके साथ युद्ध करने के स्थान पर उन्हें काफ़ी धन देकर वापस लौटा दिया । उसने सोचा कि लड़ाई में रक्तपात से धन देना अच्छा है , परन्तु इस तरह मंगोलों की धन – लिप्सा और बढ़ गई । उन्होंने बार बार आक्रमण करने आरम्भ कर दिए । मुहम्मद तुगलक को अपनी भूल का पता चला ; इसलिए उसे पुन : दिल्ली को अपनी राजधानी बनाना पड़ा ।

मुहम्मद तुग़लक़ की विफलता के कारण

खुरासान पर आक्रमण करने की योजना ( The Khurasan Expedition ) – मुहम्मद तुगलक की कल्पित योजनाएं

मुहम्मद तुगलक के मस्तिष्क में एक नई योजना आई । वह विश्वविजयी बनना चाहता था । बरनी ( Barni ) लिखता है कि ” वह ( मुहम्मद ) इतना महत्वाकांक्षी था कि वह धरती तथा आकाश के प्रत्येक कोने पर अपना अधिकार जमा लेना चाहता था । ” सुलतान ने 1337 ई० में खुरासान पर आक्रमण करने की योजना बनाई । उस समय खुरासान कोई शक्तिशाली राज्य नहीं था ; इसलिए मगोलों का नेता तारमशीरी तथा मिश्र का राजा , दोनों ही उसे हड़प लेना चाहते थे । मुहम्मद तुगलक भी पीछे नहीं रहना चाहता था । उसने खुरासान पर आक्रमण करने के लिए 3 लाख 70 हजार जवानों की सेना तैयार की । इस विशाल सेना को एक वर्ष तक सरकार की ओर से वेतन मिलता रहा । एक वर्ष पश्चात् मंगोल शासक को सिंहासन से अलग कर दिया गया । मिस्र से भी खुरासान का समझौता हो गया था । इस तरह के परिवर्तन से सुलतान ने खुरासान पर आक्रमण करने की योजना का विचार त्याग दिया । खुरासान पर आक्रमण करने की इस योजना की भी आलोचना की जाती है । उसने वर्ष भर इतनी बड़ी सेना का गठन किया और फिर उसे भंग कर दिया । वर्ष भर सेना का वेतन देने से सुलतान का बहुत खर्च हो गया । वास्तव में यहां भी सुलतान का कोई दोष नहीं था । भाग्य ने ही उसको साथ न दिया और खुरासान की स्थिति बदल गई ।

कराचिल पर आक्रमण ( The Qarachil or Qarajal Expedition ) – मुहम्मद तुगलक की कल्पित योजनाएं

मुहम्मद तुगलक ने उत्तरी भारत के पहाड़ी प्रदेश पर आक्रमण करने के लिए एक लाख सैनिक भेजे । कई इतिहासकारों का विचार है कि यह सेना चीन के विरुद्ध भेजने की योजना थी ताकि वहां से धन प्राप्त किया जाए । उपरोक्त विचार फारिश्ता ( Farishta ) के हैं , परन्तु बरनी ( Barni ) और इतनबतूता ( Iben Batuttah ) के विचारानुसार यह अभियान कराचिल के विरुद्ध था । इस अभियान में सेना को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि मार्ग पहाड़ी था । सेना को खाद्य सामग्री भी न पहुँच सकी । ऊपर से वर्षा आरम्भ हो गई । इस प्रकार सेना की फूट , पहाड़ी मार्ग , सर्दी तथा वर्षा आदि कठिनाइयों के कारण सेना वापस लौटने लगी तो कराचिल के लोग उस पर टूट पड़े और सारी सेना की दुर्दशा कर दी । बरनी ( Barni ) के अनुसार समस्त सेना में से केवल दस अश्वारोही बचे थे । इतनबतूता ( Iben – Batuttah ) के अनुसार केवल तीन सैनिक बचे थे ।

इसलिए मुहम्मद तुगलक ने जितनी योजनाएं बनाईं , सभी विफल रहीं । कई इतिहासकारों ने तो उसकी योजनाओं को ‘ काल्पनिक योजनाएं ( Visionary Projects ) । भी कह दिया है , परन्तु उसकी योजनाओं का गहन अध्ययन करने और उनके आरम्भ करने के उद्देश्य की ओर दृष्टिपात करने से उनके महत्त्व का पता चलता है और यह प्रमाणित होता है कि न तो वे मूल रूप से काल्पनिक थीं और न ही सुलतान की मूर्खता का चिह्न थीं । वास्तव में सुलतान के मस्तिष्क में जब कोई योजना आती तो वह बगैर उस पर विचार किए उस पर अमल आरम्भ कर देता था । जब मध्य में ही उसकी विफलता नज़र आती तो वह उसे ठप्प कर देता था । सुलतान की जल्दबाज़ी की आदत ने उसकी सभी योजनाओं को विफल बना दिया । इतिहासकार लेनपूल ( Lanepoole ) ने लिखा है , ” अपने उच्च उद्देश्यों और उत्तम विचारों के होते हुए भी संतुलित अथवा धैर्य और यथोचित भावों के अभाव में मुहम्मद तुगलक पूर्ण रूप से विफल रहा । “

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