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शेरशाह सूरी की शिक्षा

शेरशाह सूरी की शिक्षा ( Education of Sher Shah Suri )

फ़रीद खां के पिता हसन खां ने चार विवाह करवाए थे । वह अपनी सब से छोटी पत्नी से बहुत प्रेम करता था । हसन अपनी सब से बड़ी पत्नी जिसका पुत्र फरीद था , को अच्छा नहीं समझता था । इसलिए बचपन में फरीद को अपनी सौतेली मां के हाथों बहुत कष्ट सहन करने पड़े थे । उसी से तंग आकर वह 1494 ई० में जौनपुर ( Jaunpur ) चला गया जो उन दिनों इस्लामी शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था । वहां जाकर फरीद ने बहुत मेहनत की और गुलिस्तां ( Gulistan ) , बोस्तां ( Bostan ) और सिकन्दरनामा ( Sikander Nama ) आदि प्रसिद्ध पुस्तकें रट लीं । उसकी मेहनत तथा योग्यता ने जमाल खां ( Jamal Khan ) को अपनी ओर आकर्षित कर लिया । फरीद के पिता हसन खां पर भी जमाल खां के बहुत एहसान थे ; इसलिए हसन खां ने जमाल के बीच – बचाव करने से फरीद को अपनी जागीर सहसराम का प्रबन्धक बना दिया । इस जागीर का प्रबन्ध फरीद ने लगभग 21 वर्ष तक किया । यहां उसने भूमि के प्रबन्ध के सम्बन्ध में पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया , जिसका उसने बाद में भारत का सम्राट् बनकर पूरा – पूरा उपयोग किया । जागीर के श्रमिकों से उसका व्यवहार बहुत अच्छा होता था । उसने भ्रष्टाचार तथा अव्यवस्था को समाप्त करने का सराहनीय यत्न किया । इससे फरीद की लोक प्रियता बढ़ गई ।

जानिये शेरशाह सूरी के प्रारंभिक जीवन के बारे में

फरीद की सौतेली मां से उसकी प्रसिद्धि सहन न हुई । उसने इसे तंग करना आरम्भ कर दिया और वह तंग आकर बिहार के सूबेदार बहार खां लोहानी ( Bahar Khan Lohani ) के पास चला गया । लोहानी के पास फरीद ने बहुत मेहनत तथा लगन से काम किया जिससे वह सूबेदार की दृष्टि में चढ़ गया । एक दिन वह लोहानी के साथ शिकार खेलने गया तो उसने एक शेर को निहन्थे मार डाला , जिससे प्रसन्न होकर लोहानी ने उसे शेर खां की उपाधि प्रदान की । बाद में बहार खां ने उसे अपने अवयस्क पुत्र जलाल खां ( Jalal Khan ) का शिक्षक नियुक्त किया । फिर उसे दक्षिणी बिहार का उप – राज्यपाल भी बना दिया गया ।

शेर खां की यह उन्नति लोहानी सरदारों तथा दूसरे अफगान सरदारों से न देखी गई । वे उससे ईष्र्या करने लगे । उन्होंने बहार खां के कान भरने आरम्भ कर दिए और परिणाम यह हुआ कि शेर खां को बहार खां की नौकरी छोड़कर मुगलों की नौकरी करनी पड़ी । बहार खां के पास वह 1519 से 1526 ई० तक रहा । इसके पश्चात् शेर खां ने बाबर के पास रहकर मुगल सेना की दुर्बलताओं को जानने का प्रयत्न किया और शीघ्र ही इस उद्देश्य में सफल भी हो गया । बाबर के पास वह अप्रैल 1527 से जून 1528 तक रहा । बाबर भी शेर खां के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह सका , परन्तु उसने अपने पुत्र हुमायू तथा दूसरे अन्य सेनापतियों से शेर खां के सम्बन्ध में बता दिया था कि उससे सावधान रहने की आवश्यकता है । यह कभी भी मुगलों के लिए विपदाओं का कारण बन सकता है । शेर खां को बन्दी बनाने के सम्बन्ध में बाबर अभी सोच ही रहा था कि वह भाग कर पुनः बिहार में बहार खां के पास चला गया ।

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