Tuesday , 16 July 2019
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शेरशाह सूरी की सफलता के कारण

इतिहास साक्षी है कि शेरशाह का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ । उसने अपनी योग्यता , लगन , उत्साह , बुद्धि और बाहुबल से ही अफगान राज्य स्थापित कर लिया था । उसने उस समय अफगान राज्य की स्थापना की जिस समय अफगानों की शक्ति का विनाश और मुगल शक्ति पांव जमा चुकी थी । शेरशाह ने मुगल राज्य के स्थान पर केवल दूसरा अफगान साम्राज्य ही स्थापित नहीं किया बल्कि उसका विस्तार भी किया था । उसकी सफलता के निम्नलिखित कारण थे :—

प्रारम्भिक परिस्थितियां ( Initial Circumstances )

इतिहासकारों का विचार है कि शेरशाह की सफलता का कारण उसकी प्रारम्भिक परिस्थितियां ही थीं । पिता का प्यार तो उसे मिला ही नहीं क्योंकि वह उसकी सौतेली माता के प्रभावाधीन था । परन्तु सौतेली मां का बुरा व्यवहार जरूर मिला । इसके उसे दो लाभ हुए । एक तो उसको कठिनाइयों का सामना करने की आदत हो गई और दूसरा लाभ यह हुआ कि इस से उसके जीवन में एक परिवर्तन भी आ गया । जहां उसे प्रतिभा के विकास का अवसर मिला वहां उसने कई प्रकार का ज्ञान भी प्राप्त किया जो उसके आने वाले जीवन के लिए सफलता का कारण बना ।

पहले जीवन का अनुभव ( Past Experience )

कुछ इतिहासकारों का या विचार है कि शेरशाह के पहले जीवन के अनुभव ने उसको आने वाले जीवन सफलता में बहुत योग दिया । उसको अपने प्रारम्भिक जीवन में ही अपने पिता की जागीर का प्रबन्ध करना पड़ा वहां ही उसने भूमि सुधार के बारे में अनुभव प्राप्त किया था । जमींदारों के मार्ग में आई कठिनाइयों और उपद्रवों का अनुभव भी वहीं मिला था । इसलिए हम कह सकते हैं कि जागीर से ही उसे प्रबन्धक और सैनिक अनुभव की प्राप्ति हुई थी । इसके बाद उसने मुगलों की सेना में भर्ती होकर मुगलों के सैनिक प्रबन्ध , उनकी युद्ध विधि , उनके प्रबन्ध की विशेषताएं और कमियों का अनुभव प्राप्त किया था । मुगल सेना की नौकरी छोड़ कर उसने बिहार के शासक के पास नौकरी करके राजनीति और कूटनीति का ज्ञान प्राप्त कर लिया था । इससे सिद्ध हुआ कि दूसरे अफगान साम्राज्य को कायम करने में शेरशाह का पहला अनुभव बहुत सहायक सिद्ध हुआ ।

शेरशाह सूरी की कालिंजर पर विजय

अनुकूल समय या अच्छा भाग्य ( Favourable time or Good luck )

शेरशाह के महान् तथा शक्तिशाली बनने में अनुकूल समय अथवा भाग्य ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की । यह उसका अच्छा भाग्य ही था कि उसने उस समय सिर उठाया जब हुमायू गुजरात के बादशाह बहादुरशाह के विरुद्ध लड़ाई आरम्भ कर चुका था । यह शेरशाह का सौभाग्य नहीं तो क्या था कि हुमायू ने चुनार में कोई नौ मास का समय लगा दिया और उसे बंगाल विजय करने का स्वर्ण अवसर प्रदान किया । इस बात से शेरशाह का भाग्यशाली होना प्रकट नहीं होता है कि हुमायू ने कई मास गौड़ में गरलियां मनाने में ही व्यतीत कर दिए और उसे ( शेरशाह को ) अपनी शक्ति एकत्रित करने और हुमायू को चौसा के स्थान पर धराशायी करने का अवसर मिल गया । यह भी शेरशाह का सौभाग्य ही था कि कन्नौज की लड़ाई में बहुत वर्षा हुई , जिसने उस की विजय में अद्भुत योगदान दिया । अतः यदि हम यह कहे कि शेरशाह किस्मत का धनी था और भाग्य ने ही सफलतामों से उसका दामन भर दिया , तो हमारा कथन , शत – प्रतिशत ठीक ही होगा ।

संगठन शक्ति ( Organising power )

शेरशाह सूरी का सफलता में उस की संगठन शक्ति ने भी योग दिया । उसने उस समय एक शक्तिशाली सेना का गठन किया , जिस समय मुगलों के कारण अफगान निराश हो चुके थे । उसने बिखरी हुई । अफगान शक्ति को इस प्रकार एकता की लड़ी में पिरोया कि उस ने मुगल शासन को भारत मे खदेड़ दिया ।

शेरशाह की प्रकृति ( Nature of Sher Shah )

शेरशाह सूरी की एक विशेषता थी कि वह अपनी योजनाएं बहुत ध्यान से बनाता था । कभी भी उस काम में हाथ नहीं डालता था जिसमें सफलता के बारे उसको शंका हो । वह कल्पना से असली जीवन की स्पष्टताओं को सम्मुख रख कर कदम उठाता था । यदि वह कोई काम प्रारम्भ कर देता था तो उसको पूर्ण किए बिना सांस नहीं लेता था ।

शेरशाह सूरी भारत का सम्राट कैसे बना

वीर सैनिक और योग्य सेनापति ( Brave soldier and Capable General )

शेरशाह सूरी की सफलता का यह भी कारण था कि वह एक वीर सैनिक और योग्य सेनापति था । वह बहादुर योद्धा , निर्भय सैनिक और निधड़क सेनापति था । तूफानों से खेलना तो मानो उसकी आदत ही बन चुकी थी । भयानक से भयानक कष्ट या कठिनाई उसका मार्ग नहीं रोक सकते थे । कोई दुःखदायक घटना या खतरा उसके लिए कोई महत्व नहीं रखता था । वह स्वयं लड़ रहा हो या सिपाहियों का नेतृत्व कर रहा हो , धीरज और साहस सदा उस के साथ रहते थे । वह सोचता था कि मनुष्य के लिए प्रत्येक काम करना सम्भव है । इसीलिए जिस ओर उस ने मुख किया , सफलता उसके चरण चूमती थी ।

समय का उचित प्रयोग ( Proper use of time )

शेरशाह की सफलता का एक कारण यह भी था कि वह समय का सदा उचित प्रयोग करता था । एक पल भी उसने कभी व्यर्थ नहीं गंवाया था । वह विजय प्राप्त करके प्रसन्नता में समय ( हुमायू की तरह ) नष्ट नहीं करता था । समय की पुकार सुन वह साधारण सैनिक के काम करने से भी नहीं कतराता था । यह उसका महान् गुण था । यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि शेरशाह समय के उचित प्रयोग के कारण ही भारत का सम्राट् बना था ।

दृढ़ – विश्वास ( Strong – Determination )

दृढ़ – विश्वास सफलता – प्राप्ति के लिए सीढ़ी का काम देता है । दृढ़ – विश्वास के अभाव में कोई व्यक्ति प्रगति नहीं कर सकता । शेरशाह तो बहुत दृढ़ विश्वासी मनुष्य था । वह जिस कार्य को करना आरम्भ करता था उसको कभी अधूरा नहीं छोड़ता था । वह धुन का पक्का व लग्न का सच्चा था । उसने मुगलों को भारत से निकालने का निश्चय किया था और इसमें सफलता प्राप्त की थी ।

चतुर नीतिज्ञ ( Clever Diplomat )

शेरशाह सूरी की सफलता का एक कारण यह भी था कि वह एक चतुर नीतिज्ञ था । उसको मालूम था कि किस शत्रु के आगे नतमस्तक होना है और किस से टक्कर लेनी है । जब हुमायू शक्ति का स्वामी था , उससे टक्कर नहीं ली । चुनार में उसने यही नीति अपनाई थी । जब उसकी शक्ति बढ़ी तो उसने चौसा और कन्नौज के युद्ध करके उसको बुरी तरह पराजित किया । कूटनीति से ही मालदेव को भी नकली पत्र फेंक कर पराजित किया ।

शेरशाह सूरी की मारवाड़ पर विजय

योग्य प्रबन्धक ( Capable Administrator )

शेरशाह जहां महान् सेनापति , शूरवीर सैनिक , चतुर कूटनीतिज्ञ और दृढ़ विश्वास का व्यक्ति था , वहीं वह सफल प्रबन्धक भी था जिसने उसको सफलता प्रदान की । उसने राज – प्रबन्ध इस प्रकार की पद्धतियों पर चलाया कि आने वाले समय के लिए वह आदर्श बन गया । शेरशाह के शासन प्रबन्ध की रूपरेखा ने ही अकबर की महानता का रास्ता खोल दिया था । उसकी प्रबन्धक के रूप में सफलता का कारण जनता का सहयोग था और जनता उसको सहयोग देती है जिसको वह प्यार करती है और प्यार तभी कर सकती है यदि राजा भी जनता की भलाई का ध्यान रखे शेरशाह सदा जनता की भलाई सामने रखता था ।

परिश्रमशील ( Hard – Working )

शेरशाह की सफलता का यह भी कारण था कि वह स्वयं बहुत परिश्रमी था । उसने परिश्रम और लग्न से ही एक साधारण व्यक्ति से ऊपर उठ कर भारत का सिंहासन प्राप्त किया था । वह भारत का सम्राट् बन कर भी ऐश्वर्य पूर्ण जीवन व्यतीत नहीं करता था बल्कि साधारण व्यक्ति से कहीं बढ़कर परिश्रम करता था । उसमें घमंड और मान नहीं था । वह हर परिश्रमी का सम्मान करता था । उसकी सफलता में उसके परिश्रम का भी योग था ।

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