Friday , 24 May 2019
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बाबर की विजय के कारण

बाबर की लड़ाईयों में विजय के कारण

भारत की राजनीतिक स्थिति ( Political Condition of India )

देश की राजनीतिक स्थिति बाबर की विजय का मुख्य कारण थी । सारा देश छोटे – छोटे राज्यों में बंटा हुआ था और छोटी – छोटी बातों पर इन में लड़ाई होती रहती थी और उनकी शक्ति पारस्परिक झगड़ों में ही नष्ट हो जाती थी । देश में कोई केन्द्रीय शक्ति न थी जो बाबर का मुकाबला कर सकती ।

इब्राहीम लोधी का चरित्र ( Character of Ibrahim Lodhi )

इब्राहीम लोधी दूषित प्रकृति का व्यक्ति था । वह बहुत अभिमानी तथा कठोर था । उसने अपने अमीर – वजीरों को रुष्ट कर लिया था । उसके अपने सम्बन्धी भी उसके विरुद्ध हो गए थे , और तो और उसका चाचा आलम खां भी उसके विरुद्ध था जिसने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया था । इस प्रकार जन साधारण में इब्राहीम बदनाम हो चुका था । इस बात का बाबर ने पूरी तरह लाभ उठाया ।

राजपूतों के पारस्परिक झगड़े ( Quarrels among the Rajputs )

शौर्य में राजपूत किसी प्रकार भी मुगलों से कम नहीं थे , परन्तु उनकी पारस्परिक ईष्र्या तथा झगड़ों ने उनकी शक्ति को नष्ट कर दिया था । न ही वे राष्ट्रीय संकट के समय एकत्र हो सके थे । ऐसी स्थिति में बाबर की विजय होना स्वाभाविक ही थी ।

बाबर द्वारा लड़े गए प्रमुख युद्ध

बाबर की अनुशासित सेना ( Disciplined Army of Babur )

बाबर की सेना को जहां लड़ाई के नए ढंग आते थे , वहां उसकी सेना में बहुत अनुशासन भी था । उसके तेज़ अश्वारोही संकेत मिलते ही निश्चित स्थान पर पहुंच जाते थे और शत्रु पर जा चढ़ते थे । भारतीय सेना में अनुशासन की बहुत कमी थी और उसके हाथी बहुत धीमी गति से चलते थे । जब वे पीछे की ओर मुह फेर लेते थे तो अपनी ही सेना को कुचल कर रख देते थे ।

बाबर का तोपखाना ( Babur ‘ s Artillery )

बाबर ने भारत की सभी लड़ाइयों में तोपखाना प्रयुक्त किया था , जिसके प्रयोग का भारतीयों को भली – भांति ज्ञान नहीं था । उसके तोपखाने ने भारतीय सेनाओं को नष्ट ही नहीं किया बल्कि उनके साहस को भी बुरी तरह तोड़ा । बाबर के प्रसिद्ध तोप चालक मुस्तफा ( Mustafa ) और उस्ताद अली ( Ustad Ali ) में इतनी शक्ति थी कि वे बड़ी से बड़ी शत्रु सेना को भी तोपखाने से उड़ा सकते थे ।

बाबर का व्यक्तित्व ( Babur ‘ s Personality )

बाबर की विजय का कारण उसका अपना प्रभावशाली व्यक्तित्व भी था । उसे जहां युद्धों का अनुभव था , वहां उसे कष्टों तथा कठिनाइयों के समय धैर्य बनाए रखना भी आता था । उसमें अदम्य साहस था । उसमें दूरदर्शिता कूट – कूट कर मरी हुई थी । उसके भाषण में जादू का सा प्रभाव था । वह जन्मजात सेनापति था जिसे लड़ाई के सभी ढंगों व तरीकों का ज्ञान था । उसे लड़ाई में सेना की व्यूह – रचना करनी आती थी ।

बाबर के सैनिकों की स्वामिभक्ति ( Devotion of Babur ‘ s Soldiers )

बाबर के सिपाही केवल धन के लिए बाबर के साथ नहीं थे । वे तो अपने देश तथा स्वामी के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तैयार थे । उनमें भारतीय सिपाहियों की भांति केवल धन का लालच नहीं था ; इसीलिए उनके प्रयत्नों से बाबर भारत का सम्राट् बन गया ।

बाबर का साम्राज्य ( Babur ‘ s Empire )

इस प्रकार सभी युद्धों में विजय प्राप्त करके बाबर ने भारत के बहुत से भागों पर अधिकार कर लिया था । उसका साम्राज्य पश्चिम में काबुल – कन्धार से लेकर पूर्व में बिहार तक फैला हुआ था । इस तरह उत्तर भारत में हिमालय से लेकर दक्षिण में चन्देरी तक उसके राज्य की सीमाएं थीं ।

बाबर की मृत्यु ( Babur ‘ s Death )

अभी बाबर ने विजित क्षेत्रों को अच्छी तरह संगठित भी नहीं किया था कि 26 दिसम्बर , 1530 ई० को उसकी मृत्यु हो गई । कहा जाता है कि 1530 ई० में हुमायू बहुत बीमार पड़ गया , उसका बहुत इलाज करवाया गया , परन्तु वह ठीक न हो सका ।बाबर से किसी फ़कीर ने कहा कि यदि वह अपनी सबसे मूल्यवान् वस्तु दान कर दे तो हुमायू ठीक हो जाएगा । बाबर ने सोचा और इस परिणाम पर पहुंचा कि उसकी अपने प्राणों से प्रिय कोई और वस्तु नहीं हो सकती । उसने हुमायू की चारपाई के तीन चक्कर लगाए और प्रार्थना की कि हुमायू की बीमारी उसे लग जाए ।उसकी प्रार्थना स्वीकार हुई और उस दिन से बाबर बीमार पड़ गया और हुमायूं ठीक होने लगा । आखिर 26 दिसम्बर , 1530 को बाबर की मृत्यु हो गैइ । उसकी इच्छानुसार उसे काबुल में दफनाया गया ।

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