Thursday , 23 May 2019
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खानवा की लड़ाई

खानवा की लड़ाई के कारण ( Causes of the Battle of Khanwa )

बाबर को मेवाड़ के शासक राणा सांगा ने भारत पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया था । उसका विचार था कि शेष लुटेरों की भांति बाबर लूटमार करके लौट जाएगा और वह सुविधा से थके हुए अफ़गानों को परास्त करके दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार कर लेगा , पर राणा सांगा की आशाएं मिट्टी में मिल गई जब बाबर ने यहीं रहकर अपना साम्राज्य स्थापित करने का निश्चय कर लिया ; इसलिए राणा सांगा बाबर से दो – दो हाथ करना चाहता था ।

बाबर ने भी यद्यपि दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार कर लिया था , परन्तु उसे समस्त भारत का शासक नहीं माना जा सकता था जब तक कि वह राजपूतों को कमरतोड़ पराजय न देता ; इसलिए बाबर भी राजपूतों से टक्कर लेना चाहता था ।

बाबर का पानीपत की लड़ाई में सफलता के कारण

जब बाबर को राणा सांगा ने भारत पर आक्रमण करने के लिये आमन्त्रित किया था तो साथ ही उसने मुगलों की लोधी साम्राज्य के विरुद्ध सहायता करने का वचन भी दिया था । जब पानीपत की लड़ाई में बाबर इब्राहीम की सेनाओं से लोहा ले रहा था तो राजपूत दूर खड़े तमाशा देखते रहे । बाबर राजपूतों को इस विश्वासघात का मज़ा चखाना चाहता था ।

घटनाएं जो खानवा की लड़ाई का कारण बनीं ( Events leading to the battle of Khanwa )

राजपूतों से लड़ने का बाबर ने निश्चय तो कर लिया , परन्तु यह सरल बात नहीं थी क्योंकि शौर्य तथा साहस में राजपूत किसी तरह भी मुगलों से कम नहीं थे । राजपूतों का सेनापति राणा सांगा एक अनुभवी और सुलझा हुआ सेनापति था , जिसने कई युद्ध किये थे और विजय प्राप्त की थी । राणा सांगा को कई और सरदारों जैसे मारवाड़ , अम्बर , अजमेर , चंदेरी तथा ग्वालियर के शासकों ने अपनी सेनाएं दे दी थीं । बाबर जब इब्राहीम से लड़ रहा था तो राणा सांगा इसलिए चुप रहा था कि दूसरे लूटेरों की भांति बाबर भी लूट – मार करके लौट जाएगा , परन्तु जब बाबर यहीं जम गया तो राणा सांगा ने बाबर के विरुद्ध युद्ध की तैयारी आरम्भ कर दी ।

राजपूतों की सैनिक तैयारियां ( Military Preparations of Rajputs )

लेनपुल ( Lanepoole ) के अनुसार राणा सांगा के साथ लगभग 120 बड़े – बड़े सरदार आ मिले थे । इन सरदारों की सेनाओं के साथ 80 हजार अश्वारोहियों और 500 हाथियों सहित राणा सांगा बाबर के विरुद्ध युद्ध करने के लिए चल पड़ा । मार्ग में और कई मुसलमान राजा भी राणा सांगा से आ मिले थे । राणा सांगा ने बुद्धिमत्ता से काम लिया और इब्राहीम लोधी के भाई महमूद लोधी को दिल्ली का सुलतान स्वीकार कर लिया । वह भी राणा के साथ हो लिया ।

पानीपत की पहली लड़ाई

बाबर की सेनाओं का उत्साह कम होना ( Babur’s soldiers got demoraliesd )

राणा सांगा की इतनी तैयारी देखकर बाबर के सिपाहियों का साहस टूट गया । वे बाबर को काबुल की ओर चले जाने के लिए विवश कर रहे थे । उन्हें राजपूतों की बहादुरी का भी ज्ञान था ; इसलिए उन्हें विजय की आशा नहीं थी । दूसरे उस समय काबुल के एक ज्योतिषी ने समाचार फैला दिया कि लड़ाई में मुगलों की पराजय निश्चित है । इससे बाबर के सिपाहियों के दिल और भी बैठ गए ।

बाबर का जोशीला भाषण ( Inspiring speech of Babur )

बाबर के सैनिकों द्वारा राजपूतों के विरुद्ध लड़ने से इन्कार कर देने से उसके सामने एक विकट समस्या उत्पन्न हो गई । परन्तु बाबर तो लौह – पुरुष था । उसने धैर्य से काम लिया और कनवाहा के रण – क्षेत्र में अपने हतोत्साहित सैनिकों में एक जोशीला भाषण देकर उनकी नसों में खून का संचार किया । उसने शराब पीने के प्याले चकनाचूर कर दिए और शराब को हाथ न लगाने की सौगन्ध खाई । बाबर ने अपने सैनिकों को सम्बोधित करते हुए कहा , “ सबसे उत्तम प्रभु ने हम लोगों पर दया की है और हम लोगों को इस प्रकार के संकट में डाल दिया कि यदि हम रणभूमि में गिर पड़ते हैं तो शहीद की मौत मरते हैं और यदि जीवित रहते हैं । तो प्रभु की इच्छा अनुसार विजयी बनते हैं , इसलिए आओ हम एक आवाज़ से उस अल्ला की शपथ खाएं कि जब तक आत्मा हमारे शरीर को छोड़ नहीं जाती , तब तक हम में से कोई भी युद्ध से मुंह मोड़ने की बात नहीं सोचेगा और न ही इस युद्ध और रक्तपात , जो आगे होने वाला है , से डरकर , भागेगा । ”

इस भाषण ने बाबर के सिपाहियों में अदम्य साहस का संचार कर दिया और संब सिपाही धर्म के नाम पर शहीद होने के लिए तैयार हो गए ।

बाबर के भारत पर पांच प्रमुख आक्रमण

खानवा युद्ध की घटनाएं ( Events of the Khanwa war )

16 मार्च , 1527 ई० को प्रातः साढ़े नौ बजे दोनों । सेनाओं की टक्कर कनवाहा ( Kanwaha ) ( कईयों ने खनुआ भी लिखा है ) सीकरी ( Sikri ) के निकट हुई । यहां बाबर ने अपनी सेना की वही योजना रखी थी , जो उसने पानीपत की लड़ाई में रखी थी । उसी प्रकार गड्डे और उसी प्रकार की , खन्दके थीं , तोपखाना भी उसी प्रकार रखा गया और दाएं बाएं अश्वारोही भी उसी प्रकार किनारों पर खड़े थे ।

लड़ाई में राजपूतों का पलड़ा भारी दीख रहा था , परन्तु बाबर के तोपखाने के सामने बहादुर और सिरधड़ की बाजी लगाने वाले राजपूतों की एक न चली । बाबर पग – पग पर अपनी सेना का साहस बढ़ा रहा था । उसके अश्वारोहियों ने तुल्गामा की उज्बेगी युद्ध – पद्धति से शत्रु पर घेरा डाल लिया । राजपूतों ने साहस छोड़ दिया और उनकी सेना में भगदड़ मच गई । केवल दस घण्टे ही लड़ाई हुई जिसमें राजपूतों को भारी क्षति उठानी पड़ी । राणा सांगा घायल हो गया । उसे बेहोशी की दशा में रणभूमि से बाहर लाया गया । उसकी जान तो बच गई परन्तु इस अपमान को न सह सका और दो वर्ष पश्चात् चल बसा । विजय ने पुनः मुगलों का पक्ष लिया और राजपूतों की पराजय हुई ।

बाबर की काबुल पर विजय

खानवा की लड़ाई का परिणाम और महत्व ( Result and Importance of The Battle Khanwa )

खानवा के युद्ध का भारत के इतिहास में विशेष महत्व है :-

  1. इसकी विजय के पश्चात् बाबर भारत का सम्राट बन गया ।
  2. पानीपत की लड़ाई के पश्चात् बाबर केवल दिल्ली और आगरा का स्वामी बन गया था , परन्तु इस लड़ाई के पश्चात् वह लगभग सारे उत्तरी भारत का स्वामी बन गया था ।
  3. राजपूतों की हार के पश्चात् बाबर का कोई भी ऐसा शत्रु न रहा , जो उसकी शक्ति का मुकाबला कर सके ।
  4. बाबर के जीवन में इस लड़ाई ने एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन ला दिया । इससे पूर्व वह राज्य – प्राप्ति के लिये इधर – उधर दौड़ता – फिरता था , परन्तु अब उसका भाग्य जाग उठा था और उसके भटकने का समय समाप्त हो चुका था क्योंकि अब वह दिल्ली राज्य का स्वामी बन चुका था ।
  5. राजपूतों की शक्ति समाप्त हो गई ।
  6. प्रो. रशब्रूक विलियम ( Rushbrook Williams ) के विचारानुसार मुगल शक्ति भारत में दृढ़ हो गई और बाबर दिल्ली के सिंहासन पर बैठ गया ।
  7. राजपूतों के दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार करने तथा हिन्दू राज्य की स्थापना के स्वप्न सदा के लिए लुप्त हो गए । उनकी शक्ति इतनी विखर चुकी थी कि फिर इकट्ठी न हो सकी ।

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