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अकबर की राजपूत नीति क्या थी

अकबर की राजपूत नीति क्या थी ? ( What was Rajput Policy of Akbar ? )

अकबर की राजपूत नीति का मुख्य आधार राजपूतों के साथ प्रेमपूर्ण एवं मैत्री पूर्ण व्यवहार था , जिससे ये उसके सम्पर्क में आ सके और अकबर के लिए स्वयं को भी बलिदान कर सकें । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अकबर ने निम्नलिखित उपाय किए :—

( i ) समानता का व्यवहार ( Treatment on the basis of Equality ) अलाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद तुगलक के हिन्दों से बुरे व्यवहार से राजपूतों की आर्थिक स्थिति बहुत बिगड़ गई थी । उन्हें लक्कड़हारे तथा माशकी बना दिया गया था , परन्तु अकबर ने राजपूतों को मुसलमानों के समान अधिकार दिए और उनका हर प्रकार से ध्यान रखा ।

( ii ) वैवाहिक सम्बन्ध ( Matrimonial Alliances ) अकबर ने राजपूतों की निकटता प्राप्त करने के लिए उनसे वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित किए । सब से पहले उसने जयपुर के राजा बिहारी मल ( Bihari mal ) की पुत्री जोधा बाई से विवाह किया । इसी हिन्दू पत्नी की कोख से सलीम ( जहांगीर ) का जन्म हुआ था । इसके अतिरिक्त अकबर ने बीकानेर ( Bikaner ) और जैसलमेर ( Jaisalmer ) के राजपूत शासकों की राजकुमारियों से भी विवाह किया । इन विवाह सम्बन्धों से अकबर ने राजपूतों के दिल जीत लिए । स्वयं भी वह हिन्दू धर्म के प्रभावाधीन आ गया था । उसने अपने पुत्र सलीम का विवाह भी जयपुर के राजा भगवानवास ( Bhagwan Dass ) की पुत्री से किया था ।

( iii ) उच्च पद ( High Jobs ) अकबर ने हिन्दुओं तथा मुसलमानों की योग्यता को सामने रख कर उन्हें उच्च पद दिए । उसने हिन्दू – मुसलमान का भेदभाव मिटा कर केवल योग्यता को सामने रखा । राजा टोडरमल , राजा बिहारी मल , राजा भगवानदास , राजा मानसिंह तथा राजा बीरबल आदि सभी उच्च पदों पर नियुक्त थे । अकबर की सेना में भी आधे से अधिक सिपाही तथा अधिकारी हिन्दू थे ।

अकबर की राजपूत नीति के प्रभाव

( iv ) पराजित राजपूत तथा हिन्दू शासकों का पूरा सम्मान करना ( Giving full respect to the defeated Rajput and Hindu Rulers ) अकबर की विस्तार की नीति के मार्ग में जो भी राजपूत अथवा हिन्दू राजा आया , अकबर ने उससे कड़ा व्यवहार किया । जिन राजपूतों अथवा हिन्दू शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की , उनके विरुद्ध वह उस समय तक लड़ता रहा जब तक उन्हें अपने अधीन नहीं कर लिया । परन्तु जब उन शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तो उन्हें ( मेवाड़ के अतिरिक्त ) पूरा सम्मान दिया जिससे वे सदा के लिए अकबर के स्वामी – मक्त बन गए ।

( v ) धार्मिक स्वतन्त्रता ( Religious Freedom ) अकबर ने हिन्दुओं तथा राजपूतों को पूरी धार्मिक स्वतन्त्रता दे रखी थी । उनके मन्दिरों को कोई नष्ट नहीं कर सकता था बल्कि उन्हें पुराने मन्दिरों की मुरम्मत करवाने तथा नए मन्दिर का निर्माण करने की भी पूर्ण स्वतन्त्रता थी । वे अपने त्योहार तथा रीति – रिवाज पूरी तरह मना सकते थे । अकबर की हिन्दू पत्नियों तथा दूसरे हिन्दू नौकरों को महल के भीतर ही हिन्दू देवी – देवताओं की पूजा करने की पूरी छूट थी । उसने कुछ विशेष अवसरों पर पशु – वध पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया था ।

( vi ) जजिया , तीर्थ – यात्रा कर तथा अन्य करों की समाप्ति ( Abolition of Jazia , Pilgrimage tax and other taxes ) अकबर क्योंकि बहुत दूरदर्शी , उदार और सहनशील शासक था ; इसलिए उससे यह सहन न हो सका कि हिन्दू इसलिए कर दें कि वे हिन्दू हैं । इसलिए उसने 1563 में हिन्दू यात्रियों पर लगा धार्मिक कर हटा दिया और आगामी वर्ष ही 1564 ई० में जजिया लेना बन्द कर दिया । इसके साथ – साथ हिन्दू तथा राजपूतों पर लगे दूसरे कर भी हटा दिए गए ।

अकबर की धार्मिक नीति के प्रभाव

( vii ) समाज सुधार ( Social Reforms ) अकबर ने हिन्दुओं , विशेषकर राजपूतों को प्रसन्न करने के लिए उन सभी रीति – रिवाजों में सुधार किए जिन से वे लोग तंग आ चुके थे । सती – प्रथा तथा बाल – विवाह की कुप्रथाओं को समाप्त किया और विधवा विवाह को प्रोत्साहन दिया । किसी भी हिन्दू को बलात् मुसलमान नहीं बनाया जा सकता था ।

( viii ) हिन्दुओं और मुसलमानों के चिरकालोन सांस्कृतिक अन्तर को दूर करना ( Removal of long standing cultural differences between the Hindus and the Muslims ) कई इतिहासकारों का विचार है कि देर से आ रहे हिन्दू और मुसलमानों के बीच सांस्कृतिक अन्तर को दूर करने का भी अकबर ने पूरा – पूरा प्रयत्न किया । प्रिंसिपल श्री राम शर्मा का विचार है कि अकबर ने एक अलग ही अनुवाद विभाग खोला हुआ था , जिसमें इस विभाग के कर्तव्यों में से एक यह कर्तव्य भी होता था कि वह हिन्दू धर्म की धार्मिक पुस्तकों का फारसी में अनुवाद करे । इस विभाग ने अथर्व वेद और महाभारत जैसी पुस्तकों का फारसी में अनुवाद किया था । इस तरह पुराने हिन्दू धर्म की पुस्तकों का फारसी में अनुवाद करा कर अकबर ने पुराने सांस्कृतिक अन्तर को मिटाने का यत्न किया था ।

( ix ) बलपूर्वक धर्म परिवर्तन वजत ( Prevention of conversion by force ) अकबर ने शाही प्रदेश के साथ जबरदस्ती धर्म – परिवर्तन की मनाहीं कर दी | एक धर्म वाले किसी दूसरे धर्म वाले को किसी प्रकार का बल डाल कर धर्म परिवर्तन के लिए विवश नहीं कर सकते थे । यहां तक कि युद्ध में कैद हुए कैदियों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता था । यद्यपि इस आदेश को तुरन्त लागू नहीं किया गया था परन्तु इसका साधारण जनता पर विशेषता हिन्दू जनतः पर काफी प्रभाव पड़ा था । इसके साथ हिन्दुओं की वफ़ादारी और स्वामीभक्ति और दृढ़ हो गई थी ।

अकबर का जीवन परिचय

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