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अकबर का जीवन परिचय

अकबर का प्रारम्भिक जीवन ( Early Career of Akbar ) अकबर का जीवन

महान् मुगल सम्राट् जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर का जन्म 23 नवम्बर , 1542 ई० में हुमायू की ईरानी पत्नी हमीदा बानो ( Hamida Banu ) से उस समय अमरकोट ( Amarkot ) के स्थान पर हुआ । उस समय हुमायू मारा – मारा इधर – उधर भटक रहा था । हुमायू शेरशाह से हार खाकर अन्त में अमरकोट के राजा वीरसाल के महल में शरण लिए बैठा था । कहा जाता है कि जब अकबर का जन्म हुआ तो उसके पिता के पास कस्तरी के अतिरिक्त और कुछ नहीं था ।

उसने उसी समय सब लोगों में कस्तूरी बांट दी और अल्ला के आगे प्रार्थना की कि उसके पुत्र कीर्ति इस कस्तूरी की सुगन्ध की तरह सारे विश्व में फैल जाए । परन्तु कौन जानता था कि इस प्रकार की विपदाओं में जन्म लेने वाला बालक किसी दिन भारत के सम्राटों का शिरोमणि और मुगल वंश का स्तम्भ बनेना । वहां से हुमायू सपरिवार काबुल चला गया और अकबर के पालन – पोषण का काम अपने भाई असकरी के सुपुर्द कर गया । असकरी उस समय काबुल तथा कन्धार का शासक था ।

अकबर की राजपूत नीति के प्रभाव

असकरी ने अपने भतीजे की शिक्षा की कोई समुचित व्यवस्था न की और न ही अच्छा व्यवहार किया । शीघ्र ही हुमायू ने ईरान के शासक शाह तहमास्प ( Shah Tahmasp ) की सहायता से 1545 ई० में काबुल तथा कन्धार पर अधिकार कर लिया और पिता – पुत्र का पुनर्मिलन हो गया । हुमायू ने अपने पुत्र की शिक्षा का उचित प्रबन्ध किया । बैरम खां जैसा योग्य शिक्षक उसके लिए नियुक्त किया गया । शीघ्र ही अकबर अश्वारोहण , तीर अन्दाजी , शिकार खेलने और युद्ध – विद्या में पारंगत हो गया ।

गजनी का गवर्नर ( Governor of Gazni , 1551 – 54 )

हुमायू ने अपने पुत्र अकबर को 1551 ई० के अन्त में गज़नी का गवर्नर बना दिया । उसने वहां तीन वर्ष नाममात्र काम किया । जब 1554 ई० में हुमायू ने भारत पर आक्रमण किया तो उसने अकबर की सुरक्षा के लिए मुनीम खां को तैनात किया ।

लाहौर का गवर्नर ( Governor of Lahore )

जब हुमायू ने 1555 ई० में सरहिन्द और माछीवाड़ा की लड़ाइयों के पश्चात् दिल्ली का सिंहासन प्राप्त किया तो उसने बैरम खां के संरक्षण में अकबर को लाहौर का गवर्नर बना दिया ।

दीन-ए-इलाही के मुख्य सिद्धांत

उसका सिंहासनारोहण ( His Succession to the Throne )

1556 ई० में जब हुमायू की मृत्यु हुई , उस समय अकबर की आयु केवल 13 वर्ष 2 मास थी । उस समय अकबर बैरम खां के साथ सिकन्दर सूरी का पीछा कर रहा था । जब वह पंजाब के जिला गुरदासपुर के कलानौर ( Kalanaur ) के स्थान पर था तो उसे अपने पिता की मृत्यु का दुःखद समाचार मिला । बैरम खां ने 14 फरवरी , 1556 ई० में वहीं एक बाग के चबूतरे पर बिठाकर अकबर का राज्याभिषेक कर दिया और स्वयं उसका संरक्षक ( Regent ) बन गया ।

अकबर की प्रारम्भिक कठिनाइयां ( Early Difficulties of Akbar ) अकबर की प्रारम्भिक कठिनाइयां निम्नलिखित थीं :

( i ) प्रशासनिक अव्यवस्था ( Disorganised Administration )

सिंहासन पर तो अकबर बैठ गया , परन्तु सिंहासन था कहां ? वह तो नाम का राज्याभिषेक था एक तो वह अभी बच्चा था , दूसरे भारत में प्रशासनिक अव्यवस्था फैली हुई थी । समस्त देश का प्रशासन निष्क्रिय हो चुका था । इसका कारण यह था कि हुमायू जीवन पर्यन्त भटकता ही रहा । उसे शासन – व्यवस्था को सुधारने का अवसर ही नहीं मिला ।

अकबर की धार्मिक नीति के प्रभाव

( ii ) शत्रुओं से घेराव ( Surrounded by the enemies )

अकबर चारों ओर से शत्रुत्रों से घिरा हुआ था । यह ठीक है कि हुमायू ने सिकन्दर सूरी को पराजित कर दिया था , परन्तु वह अभी भी पंजाब में अपनी शक्ति में वृद्धि करने का प्रयत्न कर रहा था । पूर्वी प्रान्त ( बंगाल व बिहार ) में अफ़ग़ान बादशाह मुहम्मद शाह आदिल पर्याप्त शक्ति संचित कर चुका था और उसका प्रधान मन्त्री हेमू ( Hemu ) बहुत बुद्धिमान् नेता था । उसने हुमायू की मृत्यु का समाचार सुनते ही आगे बढ़कर दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार कर लिया था और राजा विक्रमाजीत के नाम से एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया था ।

( iii ) राजपूतों द्वारा शक्ति संचय ( Accumulation of power by Rajputs )

राजपूत राजाओं ने भी हुमायू के इधर – उधर भटकते समय पर्याप्त शक्ति संचित कर ली थी । विशेष कर मेवाड़ , जोधपुर व जैसलमेर के राजपूत शासकों के पास पर्याप्त सैनिक शक्ति थी और उन्होंने मुगल बादशाह से दो – दो हाथ करने का भी निर्णय कर रखा था ।

( iv ) कई राज्यों का स्वतन्त्रता घोषित करना ( Proclamation of Independence by several states )

उत्तर – पश्चिमी भारत में अकबर का सौतेला भाई मिर्जा हाकिम ( Mirza Hakim ) काबुल का स्वतन्त्र शासक था जो भारत की ओर ललचाई दृष्टि से देख रहा था । गुजरात तथा मालवा पूरी तरह स्वतन्त्र थे । इस प्रकार सिन्ध तथा मुलतान भी स्वतन्त्र राज्य थे । उनका दिल्ली से कोई सम्बन्ध नहीं था ।

ऊपरलिखित कठिनाइयों और अकबर की 13 वर्ष की आयु के दृष्टिगत अधिकांश मुगल सरदारों ने बैरम खां को अकबर सहित काबुल भाग जाने का परामर्श दिया । सरहिन्द की जंगी सभा ने भी यही निर्णय दिया था , परन्तु अकबर तथा बैरम खां ने साहस न छोड़ा और सबसे पहले हेमू से टक्कर लेने का निश्चय किया जिसने दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार जमा लिया था ।

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