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1719 से 1850 तक इटली का इतिहास

नेपोलियन बोनापार्ट द्वारा इटली के छोटे – छोटे राज्यों का अन्त कर दिया गया था । नैपोलियन के इस कार्य से वहाँ के निवासियों में राष्ट्रीयता , स्व तन्त्रता प्राप्ति आदि की भावनायें उत्पन्न हो गई थीं । अब वे देश को संगठित करने का प्रयत्न करने लगे थे ।

1815 ई० में नैपोलियन महान् के पतन के पश्चात वियेना की काँग्रेस ने इटली को पुनः छोटे – छोटे राज्यों में बाँट दिया था और प्राचीन राजवंशों के शासक वर्ग के उत्तराधिकारियों को पुनः गद्दी पर बिठा दिया गया । इन शासकों में से अनेक स्वेच्छाचारी निरंकुश और प्रतिक्रियावादी थे । उन्होंने अपने – अपने राज्यों के जनता के लाभ के कानून समाप्त कर दिए । लोम्बार्डी और बेनीशिया आस्ट्रिया साम्राज्य में मिला दिए गये । टस्कनी , पारमा , ल्यूका तथा मोडेना की छोटी – छोटी रियासतें आस्ट्रिया के राजकुमारों तथा राजकुमारियों को दे दी गई । सेवाय में विक्टर इमानुएल और रोम में पोप पहले से शासन कर रहे थे । इस प्रकार सम्पूर्ण इटली को छोटे – छोटे टुकड़ों में विभक्त करके एक भौगोलिक उक्ति ( Geographi cal Expression ) बना दिया ।

कार्बोनरी की स्थापना

यद्यपि वियेना की काँग्रेस ने इटली में पुनः निरंकुश राजाओं की स्थापना कर दी थी , परन्तु स्वतन्त्रता , समानता , भ्रातृत्व की भावना ( Liberty , Equality and Fraternity ) और राष्ट्रीयता के उच्च विचारों को जनता द्वारा न भुलाया जा सका । इटालियन देश – भक्त अब यह समझने लगे थे कि वियेना की काँग्रेस ने उनके देश के टुकड़े – टुकड़े करके विदेशी शासकों को प्रदान कर दिया है । जिससे वे सब उनके दास गुलाम बन गये हैं । इन्हीं भावनाओं से ओत – प्रोत होकर उन्होंने अपने देश को विदेशियों के चंगुल से मुक्त करने के लिए देश भर में गुप्त समितियाँ स्थापित की जो ‘ कार्बोनरी ‘ ( Carbonary ) कहलाती थीं । इस विषय में । ग्रान्ट और टेम्परले लिखते हैं , “ गुप्त संगठन इटली की एकता के लिए सारे राष्ट्र में काम करने लगा । ”

कार्बोनरी विद्रोह

धीरे – धीरे इटली में सैकड़ों गुप्त – समितियाँ स्थापित हो गयीं । इन समितियों में व्यापारी , मजदूर , सरकारी नौकर , सैनिक , विद्यार्थी इत्यादि सम्मिलित थे । परन्तु एक राज्य के कार्बोनरी सदस्य दूसरे राज्य के कार्बोनरी सदस्यों से मिलकर कार्य नहीं करते थे और न ही उनका कोई निश्चित कार्यक्रम ही था । ये गुप्त समितियाँ निरंकुश शासकों का अन्त कर स्वतन्त्रता की स्थापना करना चाहती थीं । 1820 ई० में स्पेन के देश – भक्तों ने विद्रोह कर दिया । इस विद्रोह का समाचार सुनकर नेपिल्स और पीडमाण्ट के कार्बोनरी सदस्यों ने भी विद्रोह खड़ा कर दिया । इन विद्रोहियों ने अपने – अपने देशों से निरंकुश शासन का अन्त करने का ‘ प्रयत्न किया । इन देश – भक्तों को सेना की भी सहानुभूति प्राप्त थी । नेपिल्स के राजा फडनेंड ने भयभीत होकर उदार शासन की घोषणा कर दी । उधर पीडमाण्ट के शासक विक्टर इमानुएल ने भी अपने यहाँ उदार शासन की स्थापना की । दोनों देशों की क्रान्तियाँ प्रतिक्रियावादी मेर्टानख की दृष्टि में घृणास्पद तथा संक्रामक रोगों के समान थीं जो अपना बुरा प्रभाव फैला सकती थीं । उसे भय था ‘ कि इन क्रान्तियों का प्रभाव आस्ट्रियन साम्राज्य से इटालियन साम्राज्य में न पहुँच जाय । अतः उसने इन दोनों क्रान्तियों का दमन करने के लिए वहाँ सेना भेज दी । वहाँ उदार सिद्धान्तों का अन्त कर निरंकुश शासन की स्थापना की गई ।

इटली के सारे राज्यों की गुप्त समितियों के सदस्यों ने फ्राँस की 1830 ई० की क्रान्ति और 1848 की क्रान्तियों से प्रोत्साहित हो सारे इटली में विद्रोह की । अग्नि धधका दी । टस्कनी , पीडमान्ट , पारमा , मोडेना , ल्यूका तथा नेपिल्स अादि के क्रान्तिकारियों को काफी सफलता प्राप्त हुई । परन्तु अभी समितियों के सदस्यों में संगठन का अभाव था । इसी कारण दोनों बार ग्रास्ट्रिया सेना ने उन्हें हरा दिया । सहस्रों क्रान्तिकारियों को गोलियों से भून डाला गया । हजारों देश – भक्तों को विदेशों को भाग जाना पड़ा और क्रान्तिकारियों को जेलों में ठूस दिया गया । इटली में पुनः निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी शासन की स्थापना हुई । प्रसिद्ध इतिहासकार हेज के अनुसार 1848-49 की क्रान्ति की असफलता के कारण इटली अपनी पुरानी अवस्था में पहुँच गया और छोटे छटे राज्यों में बंट गया तथा आस्ट्रिया के प्रभाव में आ गया । ”

उस समय इटली में उदासीनता छा गई और ऐसा ज्ञात होने लगा कि इटली में राष्ट्रीयता का सदा के लिए अन्त हो गया है ।

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