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1870-71 के फ्रांस एशिया के युद्ध के कारण

फ्रांस एशिया के युद्ध के कारण

1870 में नैपोलियन तृतीय की बढ़ती हुई इच्छा प्रशा के प्रधान मन्त्री बिस्मार्क की कूटनीति से टकरा गई जिसके परिणामस्वरूप नैपोलियन तृतीय के साम्राज्य का अन्त हुआ और स्वयं उसे बन्दी बनाना पड़ा । फ्राँस – प्रशिया युद्ध के निम्नलिखित कारण थे

मैक्सिको समस्या की विफलता

मैक्सिको की समस्या में नैपोलियन तृतीय को विफल होना पड़ा जिससे उसके मान को भारी आघात पहुँचा आस्ट्रिया और बेल्जियम के सम्राट उसके कट्टर शत्रु बन गये थे । यूरोपीय देशो तथा फ्रांस के राजनीतिज्ञ उसे दुर्बल , स्वार्थी आदि कह – कह कर बदनाम करने लगे । फ्राँस का करोड़ों रुपया जो इस समस्या के समाधान में व्यय हुआ था व्यर्थ रहा । अतः अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए उसे प्रशा के साथ युद्ध करना अनिवार्य हो गया ।

फ्रांस और प्रशा के मध्य तीव्र वैमनस्य

नैपोलियन महान् के पतन के समय से ही फ्राँस और प्रशा की शत्रुता चली आ रही थी । इस समय प्रशा की शक्ति बहुत अधिक बढ़ गई थी और सेडोवा के युद्ध में उसने आस्ट्रिया को हरा दिया था , इससे फ्रांस के अन्तर्राष्ट्रीय गौरव को भारी धक्का लगा । उसकी पूवी – दक्षिणी सीमा पर भीषण संकट पैदा हो गया । प्रशा से बिना युद्ध किए ही फ्राँसीसी अपने की हारे हुए समझने लगे । इसलिए दियर्स ( Thiers ) ने व्यवस्थापिका सभा में गर्जना करते हुए कहा था कि सेडोवा में वास्तव में फ्रांस की हार हुई थी ।

फ्रांसीसी लोग सेडोवा की पराजय का बदला चुकाना चाहते थे । उन्होंने फ्राँस में ‘ Revenge for Sadowa ‘ के नारों से आकाश शब्दायमान कर दिया । उधर प्रशा भी फ्रांस की इस विरोधी भावना से सुपरिचित था । उसे भी नैपोलियन प्रथम द्वारा अपमानित , लाँछित एवं तिरस्कृत किये जाने की कटु स्मृति अभी तक पीड़ा पहुँचा रही थी । दोनों ही देशों में विरोधी भावनायें प्रबल होती जा रही थीं । अतः युद्ध अधिक समय तक टाला नहीं जा सकता था ।

जर्मनी की राष्ट्रीय एकता की पूर्ति न होना

सेडोवा के युद्ध के पश्चात् प्रशा ने जर्मनी को आस्ट्रिया के प्रभाव से छुटा दिया और उतरी राज्यों का एक संघ अपने नेतृत्व में बना लिया , किन्तु वह अभी जर्मनी को एक सबल संगठित राज्य के रूप में नहीं बना सका था । अभी वह दक्षिणी जर्मनी की बवेरिया , बेडन , हेस्से और बुरटेम्बर्ग आदि राज्यों को अपने संघ में नहीं मिला सका था और बिना उसको शामिल किए एकीकरण का कार्य पूरा नहीं हो सकता था । प्रशा का चाँसलर प्रिंस बिस्मार्क यह बात जानता था कि बिना फ्राँस को हराये चारों राज्यों को जर्मनी संघ में मिलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता । वह फ्राँस की सेना को निर्बलता से भी भली – भाँति परिचित था । इसी कारण वह चाहता था कि दोनों देशों में युद्ध शीघ्र ही प्रारम्भ हो जाए जिससे फ्राँस की पराजय की नींव पर जर्मनी के एकीकरण का प्रासाद खड़ा किया जा सके । अतः युद्ध अनिवार्य था ।

नेपोलियन तृतीय की माँग

सेडोवा के युद्ध के पूर्व बिस्मार्क के सम्राट नैपोलियन तृतीय को तटस्थ रहने के बदले राइन नदी के तटवर्ती कुछ जिले देने के लिए मौखिक वचन दिया था । प्रशा की विजय होने पर नैपोलियन ने फ्रांस की सीमा रायन तक बढ़ाने के लिए लिखा । फ्राँस की सीमाओं के इस विस्तार से बवेरिया के कुछ जिले फ्रांस में आ जाते थे । बिस्मार्क ने नैपोलियन तृतीय को लिख दिया कि जर्मनी को एक इंच भी भूमि नहीं दी जा सकती है । इसी समय उसने बवेरिया के राजा को नैपोलियन की माँग से सूचित कर दिया । बेडेन , हेस्से और बरटेम्बर्ग के भी शासक नैपोलियन की और से सशंकित हो गये ।

इस प्रकार अपनी कूटनीतिज्ञता से बिस्मार्क ने नैपोलियन तृतीय को राजनैतिक दांव – पेचों में पछाड़ कर गौरवहीन बना डाला । नैपोलियन तृतीय हॉलैंड के राजा से लक्समबर्ग ( Luxemburg ) क्रय करना और बेल्जियम को फ्रांसीसी राज्य में मिलना चाहता था । बिस्मार्क ने उसके इन दोनों ही कार्यों का विरोध किया । अतः दोनों देशों के मध्य कटुता बढ़ती ही चली गई और युद्ध के बादल मंडराने लगे ।

स्पेन के उत्तराधिकार का प्रश्न

इस युद्ध का तात्कालिक कारण स्पेन के उत्तराधिकार का प्रश्न था । स्पेन में रानी इसाबेला ( Queen Issabeila ) के निरंकुश शासन के विरुद्ध वहाँ की प्रजा ने विद्रोह कर दिया । रानी विद्रोह को न दबा सकी और वह सिंहासन त्याग कर भाग गई । स्पेन की सरकार ने प्रशा के राजा के भाई राजकुमार लियोपोल्ड को राजा बनाना चाहा । उसके स्पेन का राजा बन जाने से प्रशा को राजनैतिक तथा व्यापारिक सुविधायें प्राप्त हो गई । अतः नैपोलियन तृतीय ने स्पेन के सिंहासन पर राजकुमार लियोपोल्ड को बैठाया जाना फ्राँस के हितों के विरुद्ध कह दिया । नैपोलियन तृतीय के विरोध करने के कारण राजकुमार लियोपोल्ड ने स्वयं राजा बनने से इन्कार कर दिया ।

बिस्मार्क शीघ्रातिशीघ्र फ्रांस से अल्सेस और लारेन के प्रान्त पुनः वापस लेना चाहता था और वह उसके लिए युद्ध करने को तैयार था । अतः उसने प्रशा के राजा और फ्राँस के राजदूत के बीच स्पेन के उत्तराधिकार के प्रश्न पर हुई बात चीत को जनता के सम्मुख इस ढंग से रखा कि दोनों ही देशों के निवासी उस बात चीत को अपने – अपने लिए अपमानजनक समझने लगे । पेरिस और बर्लिन में युद्ध के नारे लगाये गये । नैपोलियन तृतीय समझता था कि अभी उसकी सैनिक तैयारी अपूर्ण है अत : वह युद्ध की घोषणा करने में आना – कानी करने लगा । किन्तु साम्राज्ञी के हठ और जनता के दुराग्रह से विवश होकर उसे युद्ध की घोषणा करनी पड़ी और वह भाग्य के सहारे रणक्षेत्र में उत्तर पड़ा ।

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