Tuesday , 21 May 2019
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अलाउद्दीन का चरित्र और उपलब्धियां

अलाउद्दीन का चरित्र और उपलब्धियां ( Character and Achievements of Ala-ud-din )

अलाऊद्दीन का साम्राज्य मुगल काल से पहले के सभी मुसलमान सुलतानों में सबसे बड़ा था । अलाऊद्दीन खिलजी में जन्मजात सेनापति तथा अच्छे प्रशासक के गुण विद्यमान थे जो मध्यकाल के इतिहास में एक असाधारण सुमेल है । इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि वह एक अत्याचारी तथा निर्मम सुलतान था , परन्तु उसमें बहुत से गुण भी थे जिनके कारण उसे महान् बादशाह कहा जाता है । अलाऊद्दीन में प्रधानतया निम्नलिखित गुण थे :—

एक वीर सेनापति ( A Brave Military Commander )

अलाऊद्दीन एक वीर सेनापति था । उसने जिधर मुख उठाया , सफलता ने उसके कदम चूमें । सुलतान बनने से पूर्व ही उसने नर्मदा नदी पार कर देवगिरि पर विजय प्राप्त की थी । सुलतान बनने के पश्चात् भी उसने बहुत सी विजय प्राप्त कीं । जहां उसके सेनापति सफल नहीं होते थे , वहां वह स्वयं जा कर विजय प्राप्त करता था । 1299 में जब रणथम्भौर के युद्ध में नुसरत खां मारा गया था और उलग खां हार गया था तो सुलतान ने स्वयं रणथम्भौर पर आक्रमण करके उस पर विजय प्राप्त की थी । इसी तरह उसने 1303 में चित्तौड़ के प्रसिद्ध दुर्ग को अपने अधिकार में कर लिया था ।

मंगोल लुटेरों को परास्त करना केवल अलाऊद्दीन का ही काम था । 1299 दो लाख मंगोलों ने कुतलग ख्वाजा के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया था और वे विजय प्राप्त करते हुए दिल्ली तक आ पहुचे थे । उस समय अधिकांश सरदारों ने साहस छोड़ दिया था , परन्तु अलाऊद्दीन स्वयं रणभूमि में आया और मंगोलों की बाढ़ को रोका । इन मंगोलों ने फिर भी कई आक्रमण किए , परन्तु अलाऊद्दीन ने इनमें से एक को भी सफल नहीं होने दिया । इससे उसकी वीरता का प्रमाण मिलता है ।

यही नहीं अलाऊद्दीन ने भारत का अधिकांश भाग पर अधिकार जमा लिया था । गुजरात , रणथम्भौर , चित्तौड़ और मालवा आदि को अपने राज्य में सम्मिलित करके भारत में मुसलमान शासन को भली – भान्ति स्थायी कर दिया था । उसने मलिक काफूर की सहायता से दक्षिण भारत में इस्लामी – राज्य स्थापित कर दिया था । उसकी विजय में मलिक काफूर , नुसरत खां और उलग खां का महत्वपूर्ण योग था । इन विजयों के कारण ही यह महान् विजेता और वीर सेनापति प्रमाणित होता हैं ।

एक बुद्धिमान् तथा सफल प्रशासक ( A Successful Administrator )

अलाउद्दीन जहां एक महान् सेनापति था , वहां एक योग्य प्रशासक भी था । उसने देश में गड़बड़ को समाप्त कर शान्ति स्थापित की । उसने चोर – डाकुओं का भय समाप्त कर दिया । विदेशी आक्रमणों से देश को बचाने के लिए उसने शक्तिशाली सेना रखी थी । उसके सुधार उसके उत्तम प्रशासक होने का प्रमाण हैं । उसने भूमिकर पद्धति में सुधार किया । भूमि को फिर से मापा गया । सरदारों व भूमिपतियों की शक्ति समाप्त कर दी गई । इसी भांति उसकी गुप्तचर व्यवस्था बहुत अच्छी थी । सेना में भी कई सुधार किए । इनके अतिरिक्त शराब पीना , जुआ खेलना और जंत्र – मंत्र , जादू – टूने आदि की सामाजिक बुराइयों को दूर किया । समूचे तौर पर हम कह सकते हैं कि अलाऊद्दीन एक योग्य प्रशासक था ।

चतुर राजनीतिज्ञ ( A Clever Politician )

अलाऊद्दीन योग्य प्रशासक के साथ – साथ एक चतुर राजनीतिज्ञ भी था । जहां उसने उत्तरी भारत के प्रदेशों पर विजय प्राप्त कर के उन्हें अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया था , वहां उसने दक्षिण के राजाओं पर विजय प्राप्त करके और उनसे अधीनता स्वीकार करवा कर उससे पर्याप्त धन एकत्र कर लिया था । अलाऊद्दीन जानता था कि दूर दक्षिण पर उसका अधिकार रहना सरल बात नहीं बल्कि असम्भव है । इसी बात से उसको राजनीतिक सूझ – बूझ प्रमाणित होती है ।

समझदार व दृढ़ निश्चय वाला व्यक्ति ( A Man of Sense and Determination )

अलाऊद्दीन यद्यपि अनपढ़ था , परन्तु वह बहुत समझदार था । उसके चरित्र का विशेष गुण यह था कि वह अपनी भूल स्वीकार कर लेता था । वह दूसरों के विचारों को भी मान लेता था ; इसलिए उसने काज़ी अलऊल – मुलक के विचारों से प्रभावित हो कर नया धर्म चलाने और विश्व विजय का विचार त्याव दिया था । वह दृढ़ निश्चय का व्यक्ति था ; इसलिए उसने मंगोलों को आगे नहीं बढ़ने दिया और सरदारों की शक्ति को कठोरता से कुचल दिया और आर्थिक सुधारों को क्रियान्वित किया ।

निरंकुश परन्तु कल्याणकारी शासक ( A Bonevolent Despot )

अलाऊद्दीन स्वेच्छाचारी शासक था । वह जो उसकी इच्छा होती थी करता था , परन्तु प्रजा के कल्याण को उसने कभी दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया । उसने भारी सेना रखी थी तो केवल इसलिए कि देश की मगोल आदि विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा की जा सके अथवा विद्रोही गवर्नरों को दबाया जा सके । उसने काजियों को दबाया तो इसलिए कि कई बार उनका उपदेश जनहित के विरुद्ध होता था । उसने कड़े दण्ड दिए ताकि इनसे दूसरे अपराधियों को शिक्षा ग्रहण हो सके । अतः उसने सरदारों की शक्ति को कुचला क्योंकि उनके षड्यन्त्र लोगों को शान्तिमय जीवन व्यतीत करने से बाधक थे । उसके आर्थिक सुधार भी जनसाधारण की भलाई के लिए थे ।

मनुष्य के रूप में ( As a Man )

अलाऊद्दीन मुगल सम्राट् अकबर की भांति चाहे अनपढ़ था , परन्तु समझदार था । वह राज्य की जटिल समस्याओं को भली भांति सुलझा लेता था । काजी अलाऊल – मुलक व नुसरत खां आदि विद्वान् सदा उसकी सहायता के लिए तैयार रहते थे । अलाऊद्दीन को आखेट और बाज़ उड़ाने का बहुत शौक था । उसने कई कबूतर तथा बाज़ पाल रखे थे , जिनकी देख – रेख के लिए अनेक नौकर रखे हुए थे । बरनी के विचारानुसार अलाऊद्दीन सच्चा मुसलमान नहीं था क्योंकि वह न तो कुरान पड़ता था और न रोजे रखता था और न शुक्रवार को नमाज पढ़ने जामा मस्जिद जाता था , परन्तु अमीर खुसरो ने उसे पक्का मुसलमान कहा है । उसने लिखा है कि अलाऊद्दीन मुसलमान धर्म के विरुद्ध कुछ भी नहीं सुन सकता था । उसे पीरों व सन्तों पर बहुत विश्वास था ।

कला व साहित्य का संरक्षक ( A Patron of Art and Literature )

यद्यपि अलाऊद्दीन स्वयं अनपढ़ था , परन्तु विद्वानों का बहुत सत्कार करता था । उसके । दरबार से कई विद्वान् , कवि , इतिहासकार और दार्शनिक थे । अमीर खुसरो ( Amir Khusro ) पहले बलबन के पुत्र मुहम्मद के दरबार में था । उसकी मृत्यु के पश्चात् वह अलाऊद्दीन के पास रहा , उसे तूती – ए – हिन्द ( Parrot of India ) कहा जाता था । वह एक अच्छा गायक भी था । इसके अतिरिक्त अमीर हसन देहलवी ( Amir Hassan Dehlvi ) प्रसिद्ध कवि था , जिसे सुलतान की ओर से पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलती थी । इसी भान्ति शेख निजामुद्दीन औलिया , शेख रुकनुद्दीन आदि मुख्य धर्मात्मा थे , जिन्हें सुलतान का संरक्षण प्राप्त था । काज़ी अलाऊल – मुलक वह विद्वान् था जिसने अलाऊद्दीन को नया धर्म चलाने से रोका था । सभी विद्वानों को सुलतान का संरक्षण प्राप्त थी ।

सुलतान एक अच्छा भवन – निर्माता भी था । उसने कई मस्जिदें , कई दुर्ग तथा कई तालाब भी बनवाए थे । दिल्ली के निकट उसने एक नया नगर वसावा जो सिरी ( Siri ) के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसी भांति इलाही मीनार ( Alahi Minar ) , इलाहीं दरवाजा ( Alahi Darwaza ) और जामा मस्जिद ( Jama Masjid ) आदि भवनों का निर्माण भी उसी ने किया । निष्कर्ष यह है कि भवन – निर्माता के रूप में इतिहास में उस का प्रमुख स्थान है । बरनी लिखता है कि भवन – निर्माण पर उसने 70 हजार व्यक्ति लगा रखे थे ।

अलाऊद्दीन के चरित्र में कुछ दोष ( Some Faults in Alauddin’s Character )

अलाऊद्दीन में जहां इतने गुण थे , वहां उसमें कछ निम्नलिखित दुर्गुण भी थे :—

  1. वह एक निर्मम और अत्याचारी बादशाह था । वह अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी को कत्ल करके सिंहासनारूढ़ हुआ था और चचेरे भाइयों की आंखें निकलवा कर उन्हें अन्धा बनवा दिया था ।
  2. इसके अतिरिक्त उसमें मुख्य अवगुण यह था कि वह किसी पर भी विश्वास नहीं करता था ; इसलिए उसने अपने पुत्र खिजर खां को भी कैद कर लिया था ।
  3. हिन्दुओं पर उसने बहुत अत्याचार किए । उन्हें इतना निर्धन बना दिया कि वे रोटी से भी व्याकुल हो गए थे ।
  4. अच्छे कपड़े पहनने व घोड़े की सवारी करने की हिन्दुओं को अनुमति नहीं थी ।

अलाऊद्दीन का इतिहास में स्थान ( AlaudDin’s Place in History )

भारत के इतिहास में अलाउद्दीन का मुख्य स्थान है । वह वीर सिपाही व सफल सेनापति था । इसके अतिरिक्त महान् शक्तिशाली , महत्वाकांक्षी , महान् साहसी , मन की दृढ़ता और दूरदर्शिता उसकी मुख्य विशेषताएं थीं।

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