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1870-71 के फ्रांस एशिया के युद्ध के परिणाम

द्वितीय साम्राज्य का अन्त

युद्ध में प्रशा की विजय तो निश्चय ही थी । प्रशा की सेना ने फ्राँस की सेना को म्यूज ( Meuse ) की घाटी में सीडान नामक स्थान पर चारों ओर से घेर लिया । पहली सितम्बर 1870 को भीषण युद्ध हुआ । नैपोलियन तृतीय के कई सहस्र सैनिक मारे गए और वह 83 हजार सैनिकों सहित बन्दी बना लिया गया । सीडान की भीषण हार का समाचार पेरिस पहुँचा । वहाँ की जनता ने उसी समय विद्रोह कर दिया । नैपोलियन तृतीय का साम्राज्य बालू की दीवार की भाँति ढह गया । 4 सितम्बर को फ्राँस में गणतन्त्र की घोषणा कर दी गई ।

प्रशा का उत्कर्ष

26 जनवरी , 1871 ई० को सन्धि की प्रारम्भिक शर्ते हुई और 10 मई को दोनों देशों के मध्य फ्रेंकफर्ट की सन्धि ( Treaty of Frankfurt ) हो गई जिसके अनुसार फ्राँस द्वारा बेल्फोर्ट ( Belfort ) के अतिरिक्त सम्पूर्ण अल्सास और लारेन का पूर्वी भाग जिसमें मेज तथा स्ट्रास्बर्ग के दुर्ग भी सम्मिलित थे , प्रशा को देने पड़े । फ्राँस पर एक भारी रकम हर्जाने के रूप में लाद दी गई और निश्चित किया गया कि जब तक फ्राँस हर्जाने की रकम न चुका दे उस समय तक जर्मन सेना फ्राँस के उत्तरी – पूर्वी भाग पर अधिकार किये रहेगी और उसका व्यय फ्राँस को देना पड़ेगा । यह प्रशा का महान् उत्कर्ष था ।

फ्राँस में गणतन्त्र ( Republic ) की स्थापना

इस युद्ध के परिणाम स्वरूप फ्रांस में पुनः गणतन्त्र की स्थापना हुई । फ्रैंकफर्ट ( Frankfurt ) की सन्धि के पश्चात फ्राँस में भीषण गृह – युद्ध हुआ । फ्राँस की राष्ट्रीय असेम्बली में राजतन्त्र वादियों का बहुमत था । इस कारण पेरिस के लोगों को , जो पक्के गणतन्त्रवादी थे और जिन पर साम्यवादी विचारों का गहरा प्रभाव पड़ चुका था , यह भय उत्पन्न हो गया कि राष्ट्रीय असेम्बली देश में राजतन्त्र की पुनः स्थापना करना चाहती है । उन्होंने पेरिस से राजधानी हटाये जाने को भी अपमानजनक समझा । अतः उन्होंने राष्ट्रीय असेम्बली के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और पेरिस में कम्यून के शासन की स्थापना की । दो महीने तक पेरिस पर उनका अधिकार बना रहा ।

दियर्स ( Thiers ) ने जो कि कार्यकारिणी का प्रधान चुना गया था , पेरिस को राष्ट्रीय सेनाओं द्वारा घेर लिया । छः सप्ताह तक युद्ध होता रहा और जर्मन सेना पेरिस के चारों ओर पहाड़ियों पर डेरा डाले गृह – युद्ध का तमाशा देखती रही । अन्त में वर्साय की राजकीय सेना ने पेरिस पर अधिकार कर लिया । हजारों व्यक्तियों को गोली से मार दिया गया । लगभग दस सहस्र व्यक्तियों को देश निकाला दिया गया । इतना भीषण रक्तपात हो जाने तथा सारा पेरिस ध्वस्त हो जाने के पश्चात ही शान्ति की स्थापना हो सकी । फ्रांस में तृतीय गणतन्त्र की स्थापना की गई और 31 अगस्त 1871 को दियर्स राष्ट्रपति नियुक्त हुआ ।

जर्मनी का एकीकरण

फ्राँस के प्रभाव के कारण जर्मनी के दक्षिण राज्य के उत्तरी राज्यों के संघ में नहीं मिलाए गए , अब उन्होंने भी संघ में मिलना स्वीकार कर लिया । अतः 18 जनवरी , 1871 को वर्साय के शीशमहल में प्रशा के राजा फेड्रिक विलियम को संगठित जर्मनी का सम्राट बनाया गया । प्रशा के राजा ने सम्राट बनते ही सारे जर्मनी में संघीय शासन की स्थापना की और जर्मन सम्राट कार्यकारिणी का प्रधान बनाया गया और बलिन साम्राज्य की राजधानी । इस प्रकार जर्मनी के एकीकरण का कार्य सम्पन्न हुआ ।

इटली का एकीकरण

इस युद्ध का अन्तिम महत्त्वपूर्ण कार्य इटली का एकीकरण था । नैपोलियन का पतन हो जाने से ही यह कार्य सम्पन्न हो सका । रोम में पोप की सत्ता बनाये रखने के लिए नैपोलियन तृतीय ने वहाँ एक फ्रॉसीसी सेना रख छोड़ी थी । प्रशा के साथ युद्ध होने पर नैपोलियन को यह सेना वापस बुलानी पड़ी । सार्डिनीया का राजा विक्टर इमानुएल इस अवसर की ताक में ही था । सम्राट नैपोलियन के पतन का समाचार पाते ही उसने रोम पर अधिकार जमा लिया और पोप इस समय कुछ भी नहीं कर सका । आस्ट्रिया के हार जाने पर वेनिस पर भी उसका अधिकार हो गया । वीर गैरीबाल्डी सिसली और नेपिल्स विजय करके उसे राज्य में पहले ही मिला चुका था । अतएव रोम पर अधिकार हो जाने से इटली का एकीकरण का कार्य पूरा हो गया और रोम को इसकी राजधानी बनाया गया ।

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