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अलाऊद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधार

प्रबन्धक सुधार ( Administrative Reforms )

अलाऊद्दीन खिलजी ने देश में शान्ति बनाए रखने और विद्रोहों को रोकने के लिए अनेक प्रशासनिक सुधार किए । अलाऊद्दीन के शासन – काल में कई सरदारों ने विद्रोह किया था । इस सम्बन्ध में अलाऊद्दीन ने खूब विचार किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि इन विद्रोहों के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं :-

  1. धन का बाहुल्य ।
  2. शराब ।
  3. सरदारों व मन्त्रियों का परस्पर मिलाप ।
  4. सुलतान की उपेक्षा ।

इसलिए अलाऊद्दीन खिलजी ने देश में शान्ति बनाए रखने और विद्रोहों को रोकने के लिए तथा सरदारों की शक्ति कम करने के लिए निम्नलिखित प्रशासनिक सुधार किए :-

शासन पर धर्म के नियन्त्रण की मुवित ( Emancipation of Administration from Religious Domination ) अलाऊद्दीन पक्का मुसलमान था ; फिर भी वह शासन – व्यवस्था और धर्म को अलग – अलग रखना चाहता था । उसने सर्वप्रथम काम यह किया कि प्रशासनिक कार्यों को धार्मिक सिद्धांतों से मुक्त कर दिया । उसका विचार था कि राज्य में उसे कई पग ऐसे भी उठाने पड़ते हैं , जो इस्लाम के विपरीत हो सकते हैं , परन्तु यदि वे न उठाए जाएं तो साम्राज्य में अशांति तथा अव्यवस्था फैलती थी । इससे पूर्व महमूद से लेकर जलालुद्दीन फिरोज तक सारे सुलतान शराह ( Quranic Law ) के अनुसार ही शासन चलाते थे । उसने आंखें बन्द कर काजियों के आदेशों को मानने से इन्कार कर दिया । उसने काज़ियों तथा ‘ उल्माओं ‘ ( Ulemas ) को कहा कि शासन – व्यवस्था के नियम वे नहीं हो सकते जो पाक – कुरान अथवा मौलवी कहते थे , परन्तु वे होंगे , जिन्हें वह उचित समझता है । इस तरह काज़ी से हुआ वार्तालाप भी प्रमाणित करता है कि उसने धर्म को राज्य प्रबन्ध से सदा ही दूर रखा ।

अलाउद्दीन का चरित्र और उपलब्धियां

जागीरें छीनना ( Confiscation of Lands ) – अलाऊद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधार
सुलतान को पता था कि राज्य के विद्रोह तथा अशांति का कारण देश के बड़े – बड़े सरदार और भूपति हैं । उनका धन ही सभी बुराइयों का कारण है ; इसलिए अलाऊद्दीन ने उन सरदारों और भूपतियों से जागीरें छीन लीं और जीवनयापन के लिए पैशने लगा दी । अलाऊद्दीन जानता था कि जब तक जागीरदारों के पास धन है , वे उपद्रव करने से नहीं टलेगे , इसलिए उसने किसी न किसी ढंग से सामन्तों व जागीरदारों से धन छीन लिया ।

मदिरापान पर रोक ( Wine Forbidden )
सुलतान ने मदिरापान पर रोक लगा दी । मुख्य बात तो यह थी कि सुलतान ने स्वयं भी शराब पीनी छोड़ दी थी । शाही महल में शराब पर स्थायी प्रतिबन्ध लगा दिया गया । बोतलों तथा प्यालियों को सार्वजनिक रूप से तोड़ डाला गया । शराब की दुकानें बन्द कर दी गई । जो शराब पीता पकड़ा गया , उसे कड़ा दण्ड दिया गया । कुछ शराबियों को कुओं में भी फिकवाया गया ।

परन्तु इस नशाबन्दी का कोई अच्छा परिणाम न निकला । लोग अपने घरों में शराब तैयार करने लगे । आखिर सुलतान ने सरदारों को अपने घरो में शराब पीने की अनुमति दे दी , परन्तु सामाजिक समारोहों अथवा सार्वजनिक स्थानों पर शराब पर प्रतिबन्ध होने के कारण विद्रोह भी कम हो गए ।

परस्पर मेल – मिलाप पर प्रतिबन्ध ( Ban on Social Gatherings ) – अलाऊद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधार
सुलतान ने सरदारों के परस्पर मेल – मिलाप पर भी प्रतिबन्ध लगा दिए थे । सरदार पारस्परिक विवाह भी सुलतान की अनुमति के बिना नहीं कर सकते थे । सामाजिक संगठनों के बैठकों के रूप में एकत्र होने पर भी रोक लगा दी गई थी । यह आदेश मन्त्रियों और सरदारों के परस्पर मेल – मिलाप पर भी लागू होता था । डॉ० ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है कि “ The amenities of social life disappeared and life became intolerable burden . ” ।

गुप्तचर ( Spy ) – अलाऊद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधार
अलाऊद्दीन ने देश के विभिन्न भागों के समाचार प्राप्त करने के लिए भारी संख्या में गुप्तचर रखे हुए थे , जो देश के प्रत्येक भाग के प्रत्येक कर्मचारी पर नज़र रखते थे । सुलतान को हर समय हर प्रकार के समाचार मिलते रहते थे । कहीं भी कोई सुलतान के विरुद्ध बात नहीं करता था क्योंकि जनता बादशाह के गुप्तचरों से बहुत भयभीत थी । अलाऊद्दीन की गुप्तचर पद्धति मौर्य शासकों की गुप्तचर पद्धति से किसी तरह कम नहीं थी ।

हिन्दुओं से दुर्व्यवहार ( Hard Treatment with Hindus )
अलाऊद्दीन ने हिन्दुओं से बहुत कड़ा बर्ताव किया । हिन्दुओं के साथ व्यवहार करने के सम्बन्ध में काजी से पूछा गया तो काजी ने परामर्श दिया कि हिन्दू या तो मुसलमान हो जाएं अथवा उनकी हत्या कर दी जाए । अलाऊद्दीन ने हिन्दुओं पर कर भी डेढ़ गुणा कर दिया था और कई अतिरिक्त कर लगाकर उन्हें निर्धन बना दिया था । कई उच्च परिवारों की स्त्रियां विवश होकर मुसलमानों के घर काम करने जाती थीं । हिन्दुओं को घोड़े की सवारी करने की अनुमति नहीं थी । न ही कोई हिन्दू अपने पास शस्त्र रख सकता था । हिन्दू रेशमी वस्त्र भी नहीं पहन सकते थे । यही नहीं , हिन्दुओं को न मन्दिर बनाने की अनुमति थी और न ही वे पूजा – पाठ कर सकते थे ; अतः अलाऊद्दीन का हिन्दुओं के साथ व्यवहार अतीव्र कठोर था ।

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