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स्वतंत्रता अधिनियम तथा भारत विभाजन

स्वतंत्रता अधिनियम तथा भारत विभाजन ( The Independence Act of 1947 and Partition of India )

भारत की यह दशा देख कर अंग्रेज सरकार ने 20 फरवरी 1947 ई. को घोषणा कर दी कि वह 1948 ई. में भारत को छोड़ देगी । यदि मुस्लिम लीग ने इसमें भाग न लिया तो सरकार को सोचना पड़ेगा कि देश की बागडोर किस केन्द्रीय सरकार को सौंपी जाए । उस समय सारे देश में दंगे हो रहे थे । इसके बाद अंग्रेजों का अन्तिम वायसराय लार्ड माउंटबेटन ( Lord Mountbatten ) भारत में आया ।

वह अपनी सरकार की 20 फरवरी , 1947 ई० की घोषणा को पूरा करने के लिए आ रहा था । उसने हिन्दू – मुसलमानों अर्थात् कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में समझौता कराने का भी यत्न किया , पर इस उद्देश्य में उसे सफलता न मिली , इसलिए लार्ड माउंटबेटन ने बताया कि देश के दंगों को रोकने के लिए तथा शान्ति स्थापित करने के लिए देश का विभाजन बहुत आवश्यक हो गया है । काँग्रेस ने विवश होकर इस विभाजन को स्वीकार कर लिया ।

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जिस प्रकार माऊंटबेटन ने योजना बनाई थी , उसी के आधार पर ब्रिटिश पार्लियामेंट ने जुलाई 1947 ई. को भारत की स्वतंत्रता का अधिनियम ( The Indian Independence Act ) पास कर दिया । इसके अनुसार 1947 ई० को अंग्रेजी सरकार ने भारत को छोड़कर चले जाना था , किन्तु भारत को दो स्वतन्त्र – राष्ट्रों में बांट दिया जाएगा । वे भारत तथा पाकिस्तान होंगे ।

ठीक 15 अगस्त , 1947 ई० को अंग्रेज़ भारत छोड़ गए तथा भारतवर्ष के दो टुकड़े कर दिए गए । पाकिस्तान को ब्रिटिश बिलोचिस्तान , सिन्ध , उत्तरी – पश्चिमी सीमा प्रान्त , पश्चिमी पंजाब , पूर्वी बंगाल ( वर्तमान बंगला देश ) तथा कुछ भाग आसाम का मिला । बाकी सारा भाग भारत को मिला ।

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इस प्रकार भारत की स्वतन्त्रता का युद्ध समाप्त हो गया । इसमें महात्मा गान्धी ने बहुत बढ़ – चढ़ कर भाग लिया । विभाजन से गांधी जी को दुःख तो बहुत हुआ , पर वे विवश हो गए थे ।

स्वतन्त्रता के बाद बापू गान्धी जी को 30 जनवरी , 1948 ई० को नाथूराम गोडसे ने अपनी गोली का निशाना बना कर शहीद कर दिया । स्वतन्त्रता आन्दोलन में उन्होंने अनेक बलिदान देकर भारत को स्वतन्त्रता दिलाई थी ; इसलिए भारत की स्वतन्त्रता के इतिहास में उनका नाम चिर स्मरणीय रहेगा ।

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