Tuesday , 16 July 2019

स्वदेशी आन्दोलन

स्वदेशी आन्दोलन ( Swadeshi Movement )

कांग्रेस में तिलक जी पहले नेता थे जो इन कोरे प्रस्तावों की नीति को अच्छा नहीं समझते थे । जब अंग्रेज़ी सरकार ने कांग्रेस के प्रस्तावों की ओर कोई ध्यान न दिया तो कांग्रेस इस परिणाम पर पहुंच गई कि सचमुच ही कोई उचित कदम उठाने की आवश्यकता है । उन्हीं दिनों 1896 ई. में दक्षिण में भयानक अकाल पड़ गया । असंख्य लोग इस अकाल का शिकार हुए । अभी लोगों को अकाल के दुःख भूले न थे कि प्लेग ने उन्हें आ दबाया । सरकार इन्हें रोकने में सफल न हो सकी । तब प्रसिद्ध नेता बाल गंगाधर तिलक ने लोगों को ये विचार दिए कि सभी कष्टों का कारण अंग्रेज़ी सरकार ही है ।

जब तक यह सरकार रहेगी , भारत पर किसी न किसी कष्ट के बादल भी मंडराते रहेंगे । दूसरे शब्दों में उन्होंने सारे दुःखों का मूल कारण अंग्रेज़ी सरकार को ही ठहराया । उनकी बात सच्ची सिद्ध होने लगी क्योंकि लार्ड कर्जन ने यूनिवर्सटी एक्ट ( University Act ) पास कर दिया । फिर बंगाल का विभाजन हुआ । इससे लोगों को अंग्रेजों की धूर्तता तथा कर नीति का पूरा ज्ञान हो गया । उन्हें तिलक के शब्दों में सच्चाई दिखाई दी । इसलिए सरकार को सचेत करने के लिए 7 अगस्त , 1905 ई० को कलकत्ता में बंगालियों की ओर से बॉयकाट आन्दोलन ( Boycott Movement ) आरम्भ किया ।

साथ ही स्वदेशी आन्दोलन ( Swadeshi Movement ) भी शुरू हो गया । लोगों ने बढ़ – चढ़ कर स्वदेशी माल का प्रयोग आरम्भ कर दिया । विदेशी माल की ओर से मुंह मोड़ लिया । यह आन्दोलन सारे देश में फैल गया । 1905 ई० तथा 1906 ई० के कांग्रेस के अधिवेशनों में भी स्वदेशी आन्दोलनों को स्वीकार कर लिया गया था । इस आन्दोलन से अंग्रेजों की आर्थिक हानि हो सकती थी ; इसलिए स्वतन्तता मिलने तक स्वदेशी माल का यथासम्भव बहिष्कार होता रहा ।

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