Thursday , 18 July 2019
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गर्म दल का प्रारम्भ

गर्म दल का प्रारम्भ ( Rise of the Extremists )

जब कांग्रेस वैधानिक उपायों से अंग्रेजी सरकार से कुछ भी सुधार प्राप्त न कर सकी , तब गर्म दल वालों की शक्ति बढ़ गई । उनका कहना था कि अग्रेजों ने हम पर शक्ति से अधिकार जमाया था , हम भी शक्ति से ही उन्हें भारत से बाहर निकालेंगे । गर्म दल के नेताओं में बाल गंगाधर तिलक , लाला लाजपतराय  तथा विपिन चन्द्र पाल  आदि थे । तिलक के विचार स्पष्ट थे । उनका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा । तिलक ( Tilak ) ने कहा , ” हमें राजनीतिक अधिकारों के लिए लड़ना पड़ेगा । नर्म दल वाले सोचते हैं कि हमें शान्तिपूर्ण ढंग से इनकी प्राप्ति हो सकती है ; पर हमारा विचार है कि वे केवल शक्ति द्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं । “ उन्होंने ‘ केसरी ‘ समाचार पत्र से जहां जनता में देश – प्यार की भावना उत्पन्न कर दी थी , वहां अपनी गर्म दल की नीति का भी खूब प्रचार किया था । उन्होंने बताया कि शक्ति के बिना अंग्रेजी सरकार यहां से हिलने वाली नहीं है । आए दिन इनके विचारों वाले लोग आगे बढ़ते जा रहे थे । लाला लाजपत राय ( Lala Lajpat Rai ) जी भी इन्हीं विचारों के थे । उन्होंने भी लोगों को शक्ति के प्रयोग के लिए उभारा ।

इस प्रकार काँग्रेस में दो धड़े बन गए : नर्म दल और गर्म दल

नर्म दल वाले गर्म दल के कामों को अच्छा नहीं समझते थे । उधर गर्म दल वाले भी नर्म दल वालों की नीति को अनुपयुक्त मानते थे , इसलिए 1905 ई० में बनारस के कांग्रेस अधिवेशन में दोनों धड़ों की आपस में खूब तू – तू मैं मैं हो गई । इसी तरह 1906 ई० के अधिवेशन में भी दोनों धड़ों में झगड़ा हो गया , इसलिए 1907 ई० में गर्म दल वाले अलग हो गए । सरकार ने गर्म दल वालों के साथ अपनी कठोर नीति का व्यवहार किया । लाला लाजपत राय तथा तिलक जी जेल में ठूस दिए गए , जिससे जनता में विद्रोह की ज्वाला जलने लगी । इन्होंने हिंसा के काम भी करने शुरू कर दिए । पूना के लेफटीनेंट जनरल तथा कलक्टर को मार डाला गया । 1912 ई० में लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की घटना हुई । चाहे हार्डिंग बच गया था , पर घायल तो अवश्य हो गया था । 1922 ई० में चौरी – चौरा ( Chauri Chaura ) में पुलिस चौकी को जला डाला गया । 1929 ई० में भक्त सिंह तथा उसके साथियों ने दिल्ली की असेंबली में बम फेंका । उन दिनों अंग्रेजों को कुछ तो होश आ गई थी । कई स्थनों पर डाकघर , थाने तथा रेलवे स्टेशन जला दिए गए थे । इस प्रकार जब तक स्वतन्त्रता की प्राप्ति नहीं हुई तब तक भारतीयों को यह संघर्ष चलता रहा ।

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