Thursday , 23 May 2019
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भूकम्प

भूकम्प

भूकम्प ( Earthquake ) का तात्पर्य भू – पटल के नीचे या ऊपर चट्टानों के बीच कम्पन या गुरुत्वाकर्षण की समस्थिति ( Equilibrium ) में क्षणिक अव्यवस्था होने पर उत्पन्न हलचल से है । इस प्रकार भूकम्प का सामान्य अर्थ पृथ्वी के कम्पन से है । यह कम्पन सामान्यतः भू – गर्भ में ऊर्जा की विमुक्ति ( Release ) के कारण होता है । भूकम्प में कम्पन होने पर तरंगे उत्पन्न होती हैं , जो अपने उद्गम केन्द्र से चारों ओर चला करती हैं।

भूकम्पीय तरंगें ( Seismic waves )
भूकम्पीय तरंगें मुख्यत : दो प्रकार की होती हैं – भू – गर्भिक तरंगें ( P व S तरंगे ) व धरातलीय तरंगें ( L तरंगे ) । भू – गर्भिक तरंगें ( Body Waves ) उद्गम केन्द्र से ऊर्जा मुक्त होने के दौरान उत्पन्न होती हैं एवं पृथ्वी के आन्तरिक भागों से सभी दिशाओं में प्रसारित होती हैं ।
भूगर्भशास्त्र की एक विशेष शाखा , जिसमें भूकम्पों का अध्ययन किया जाता है , सिस्मोलॉजी कहलाता है । भूकम्प में तीन तरह के कम्पन होते है :-

प्राथमिक अथवा पी . तरंगें ( Primary or P waves )
यह तरंग पृथ्वी के अन्दर प्रत्येक माध्यम से होकर गुजरती है । इसकी औसत वेग 8 किमी प्रति सेकेण्ड होती है । यह गति सभी तरंगों से अधिक होती है । जिससे ये तरंगें किसी भी स्थान पर सबसे पहले पहुँचती है । पृथ्वी से गुजरने के लिए इन तरंगों द्वारा अपनाया गया मार्ग नतोदर होता है ।

वायुमंडल का महत्त्व

द्वितीय अथवा एस . तुरंगें ( Secondary or S waves )
S तरंगे P तरंग की उत्पत्ति के बाद S तरंग का आविर्भाव होता है । इन्हें द्वितीयक या अनुप्रस्थ तरंगे ( Transverse Waves ) भी कहते हैं । इस तरंग का संचरण वेग अपेक्षाकृत कम होता है । यह केवल ठोस माध्यम से ही होकर गुजर सकती है । इसकी गति 4.5 से 6 किमी / से होती है ।

सतही अथवा एल – तरंगे ( Surface or L – Waves )
इन्हें धरातलीय या लम्बी तरंगों के नाम से भी पुकारा जाता है । इनकी खोज H. D. Love ने की थी । इन्हें कई बार Love waves के नाम से भी पुकारा जाता है । इनका अन्य नाम R – waves ( Ray Light waves ) है । ये तरंगे मुख्यतः धरातल तक ही सीमित रहती है । ये ठोस तरल तथा गैस तीनों माध्यमों में से गुजर सकती हैं । इसकी चाल 1.5 – 3 किमी प्रति सेकेण्ड है । सतही तरंगें अत्यधिक विनाशकारी होती हैं ।

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