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प्रोग्रामिंग भाषाएँ

प्रोग्रामिंग भाषाएँ परिचय ( Introduction )
कंप्यूटर एक मशीन है, इसके लिए प्रोग्राम विशेष प्रकार की भाषाओं में लिखे जाते हैं। इन भाषाओं को प्रोग्रामिंग भाषाएँ ( Programming Languages ) कहते हैं। इन भाषाओं की अपनी एक अलग व्याकरण होती है और उनमें प्रोग्राम लिखते समय उनकी व्याकरण का पालन करना आवश्यक है। आजकल ऐसी सैंकड़ों भाषाएँ प्रचलित हैं। ये भाषाएँ कम्प्यूटर और प्रोग्रामर के बीच संपर्क या संवाद स्थापित करती हैं। कम्प्यूटर उनके माध्यम से दिये गये निर्देशों को समझकर उनके अनुसार कार्य करता है । ये निर्देश इस प्रकार दिये जाते हैं कि उनका क्रमशः पालन करने से कोई कार्य पूरा हो जाये । कम्प्यूटर द्वारा कराये जाने वाले अलग – अलग प्रकार के कार्यो के लिए अलग – अलग प्रकार की प्रोग्रामिंग भाषाओं का विकास किया गया है ।

मुख्यतः प्रोग्रामिंग भाषाएँ दो प्रकार की होती हैं-
(a) निम्न-स्तरीय भाषाएँ ( Low Level Languages )
(b) उच्च-स्तरीय भाषाएँ ( High Level Languages )

Programming languages diagram

(a) निम्न-स्तरीय भाषाएँ ( Low-level Language )
निम्न-स्तरीय भाषाएँ ऐसी प्रोग्रामिंग भाषाएँ है, जो कम्प्यूटर की आंतरिक कार्यप्रणाली के अनुरूप तैयार की गई हैं। इनमें प्रोग्राम लिखने वाले व्यक्ति को आन्तरिक कार्य प्रणाली का ज्ञान होना आवश्यक है । ऐसी भाषाओं में लिखे गये प्रोग्रामों का पालन करने ( Execution ) की गति अधिक होती है , क्योंकि कम्प्युटर उसके निर्देशों का सीधे ही पालन कर सकता है। इनको निम्न – स्तरीय भाषा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें प्रोग्राम लिखना पूरी तरह उस कम्प्यूटर पर निर्भर करता है , जिसके लिए प्रोग्राम लिखा जा रहा है। दसरे शब्दों में निम्न – स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषाएँ पूर्णत : कम्प्यूटरों पर आधारित होती हैं । इसलिए एक प्रकार के कम्प्यूटरों के लिए लिखा गया कोई भी प्रोग्राम प्रायः दुसरे प्रकार के कम्प्यूटरों पर नहीं चलाया जा सकता ।
निम्न – स्तरीय भाषाओं को भी दो वर्गों में बाँटा जाता है — मशीनी भाषाएँ ( Machine Languages ) और असेम्बली भाषाएँ ( Assembly Languages )

चौथी पीढ़ी की भाषाएँ

मशीनी भाषा ( Machine Languages )
यह कम्प्यूटर की आधारभूत भाषा है। यह द्विआधारी पद्धति ( Binary System ) में लिखी गयी भाषा है । इसमें सारे निर्देश बाइनरी अंकों 0,1 में लिखे जाते हैं । क्योंकि कम्प्यूटर केवल बाइनरी अंकों 0 और 1 के माध्मय से दिये गये निर्देशों को ही समझ सकता है ।

मशीनी भाषा में प्रत्येक निर्देश के दो भाग होते हैं —
(i) ऑपरेशन कोड या ऑपकोड ( Operation Code or Opcode ) ऑपकोड कम्प्यूटर को यह बताता है कि क्या करना है।
(ii) लोकेशन कोड या ऑपरेण्ड ( Location Code or Oprand ) ऑपरेण्ड कम्प्यूटर को यह बताता है कि आँकड़े कहाँ से प्राप्त करने हैं और कहाँ संग्रहित करने हैं ।

प्रत्येक कम्प्यूटर की अपनी अलग मशीनी भाषा होती है । कम्प्यूटर केवल अपनी मशीनी भाषा को ही समझ सकता है । प्रारम्भ में कम्प्यूटरों के लिए प्रोग्राम लिखने के लिए मशीनी भाषाओं का ही प्रयोग किया जाता था । इसके लिए कम्प्यूटर की कार्यप्रणाली का ज्ञान होना अनिवार्य होता है। इसके लिए कम्प्यूटर की कार्यप्रणाली का ज्ञान होना अनिवार्य होता है । मशीनी भाषाओं का प्रयोग केवल प्रथम पीढ़ी के कम्प्यूटरों ( First Generation of Computers ) के साथ किया जाता था । परन्तु मशीनी भाषाओं में प्रोग्राम लिखना हमारे लिए एक कठिन कार्य है , क्योंकि इसमें प्रत्येक निर्देश 0 और 1 की श्रृंखला के रूप में होता है । जैसे — 010010001110011001100101001

पहले तो ऐसे निर्देशों को लिखना ही कठिन है , क्योंकि एक भी अंक गलत हो जाने से पूरा , निर्देश गलत हो जाता है । दूसरे , इनमें त्रुटियों का पता लगाना और उनको ठीक करना लगभग असम्भव होता है । इसलिए प्रोग्राम किसी अन्य सरल भाषा में लिखा जाता है और बाद में उसका अनुवाद कम्प्यूटर की मशीनी भाषा में करा लिया जाता है ।

असेम्बली भाषा ( Assembly Language )
मशीनी भाषा में प्रोग्राम लिखने में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए एक अन्य असेम्बली भाषा का निर्माण किया गया , जो पूरी तरह मशीनी भाषाओं पर आधारित होती है , परन्तु इनमें 0 और 1 की श्रृंखलाओं के स्थान पर अंग्रेजी के अक्षर और कुछ गिने – चुने शब्दों को कोड के रूप में प्रयोग में लाया जाता है । इन कोडों को शाब्दिक कोड ( Mnemonics Code ) कहते हैं । उदाहरण के लिए जोड़ने के लिए ADD , घटाने के लिए SUB एवं किसी संख्या को स्टोर करने के निर्देश के लिए STR शाब्दिक कोड हैं । असेम्बली भाषाओं में प्रोग्राम लिखना मशीनी भाषाओं की तुलना में कहीं आसान होता है , क्योंकि बाइनरी अंकों से बनी संख्याओं की तुलना में शाब्दिक कोड को याद रखना बहुत आसान है । इसमें त्रुटियाँ भी कम होती हैं और त्रुटि हो जाने पर उसका पता लगाना और प्रोग्राम को ठीक करना भी आसान होता है ।

( b ) उच्च-स्तरीय भाषाएँ ( High-Level Language )
निम्न – स्तरीय भाषाओं की कमियाँ दूर करने हेतु कुछ ऐसी प्रोग्रामिंग भाषाओं का विकास किया गया , जो कम्प्यूटर की आन्तरिक कार्यप्रणाली पर आधारित न हों और जिनमें लिखे गये प्रोग्रामों को किसी भी प्रकार के कम्प्यूटर पर चलाया जा सके । ये भाषाएँ उच्च – स्तरीय भाषाएँ कही जाती हैं । इन भाषाओं में अंग्रेजी अक्षरों , संख्याओं एवं चिह्नों का प्रयोग किया जाता है । इन भाषाओं में प्रोग्राम लिखना , उनमें गलतियों का पता लगाना और उनको सुधारना निम्न – स्तरीय भाषाओं की तुलना में बहुत सरल होता है ।

इसलिए उपयोगकर्ताओं के लिए प्रायः सभी प्रोग्राम उच्च – स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषाओं में ही लिखे जाते हैं । उच्च – स्तरीय प्रोग्रामिक भाषाओं में लिखे गए प्रोग्रामों का भी कम्प्यूटर की मशीनी भाषा में अनुवाद करना पड़ता है । यह अनुवाद कार्य कम्पाइलर ( Compiler ) या इंटरप्रेटर ( Interpreter ) प्रोग्रामों द्वारा किया जाता है , जो कम्प्यूटर के सिस्टम सॉफ्टवेयर के भाग होते हैं ।

उच्च-स्तरीय भाषाएँ दो प्रकार की होती है—
1. विधि अभिमुखी भाषाएँ ( Procedure Oriented Languages)
2. समस्या अभिमुखी भाषाएँ ( Problem Oriented Languages )

विधि अभिमुखी भाषाएँ ( Procedure Oriented Languages)
ये ऐसी उच्च – स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषाएँ हैं , जिनमें किसी कार्य को करने ( प्रोग्राम लिखने ) के सभी चरणों को विस्तार से बताया जाता है कि उस कार्य को करने के लिए या किसी समस्या को हल करने के लिए कौन – कौन – सी क्रियाएँ किस क्रम में की जाएंगी । में ऐसे प्रोग्राम प्रायः किसी अल्गोरिद्म ( Algorithm ) पर आधारित होते हैं । इन प्रोग्रामिंग भाषाओं को तीसरी पीढ़ी की प्रोग्रामिंग भाषाएँ ( Third Generation of Programming Languages ) भी कहा जाता है । कुछ विधि अभिमुखी भाषाओं के नाम हैं – बेसिक ( Basic ) , फोरट्रॉन ( FORTRAN ) , पास्कल ( Pascal ) , सी ( C ) , फॉक्सो ( FoxPro ) आदि ।

समस्या अभिमुखी भाषाएँ ( Problem Oriented Languages )
ये ऐसी उच्च – स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषाएँ हैं , जिनमें ऐसे प्रोग्राम लिखे जाते हैं , जो किसी कार्य को करने की विधि बताये बिना किसी विशेष आउटपुट या परिणाम को निकालते हैं । इन भाषाओं में किसी समस्या को हल करने के लिए पहले से ही विधियाँ ( Procedure ) होती हैं , जिनका आवश्यकता के अनुसार उपयोग कर लिया जाता । ऐसी प्रोग्रामिंग भाषाओं को चौथी पीढ़ी की प्रोग्रामिंग भाषाएँ ( Fourth Generation of Programming Languages ) भी कहा जाता है । कुछ समस्या अभिमुखी भाषाओं के नाम हैं – विजुअल बेसिक ( Visual Basic ) , विजुअल सी ( Visual C ) , ओरेकल ( Oracle ) , एसक्यूएल ( SQL ) आदि ।

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