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भारत में सिंचाई के प्रकार

उपरोक्त स्रोतों से जो पानी मिलता है उसको खेत तक भिन्न – भिन्न ढंगों से ले जाया जाता है । सिंचाई का ढंग कोई भी हो लेकिन हमारा उद्देश्य पानी को पूरे खेत में पहुचाना होता है ताकि पानी  पौधों की जड़ों तक पहुंच जाए । पानी की कमी में पौधे जलने लगते हैं लेकिन पानी की अधिकता में आवश्यक तत्त्वों का भूमि में रिस जाने का भय बना रहता है । इसके साथ पौधे सांस भी अच्छी तरह से नहीं ले पाते । सिंचाई के ढंग निम्न प्रकार के हैं :

1 . सीधी नलियों द्वारा ( Straight Channel Method )

Straight Channel Method

यह विधि आमतौर पर बागों में प्रयोग की जाती है । इस विधि में फल – वृक्ष एक सीधी नाली द्वारा संबंधित कर लिए जाते हैं । इस नाली द्वारा पौधे पानी प्राप्त करते हैं । इस विधि द्वारा पानी थोड़े से स्थान में सीमित रहता है जिससे पूरी जड़ों को पानी नहीं मिल पाता । यह एक तरफा पानी देने की विधि है जिससे कुछ पौधों को अधिक पानी मिलता है और उनके गलने का डर रहता है यह सिंचाई की अच्छी विधि नहीं कही जाती ।

2 . बेसिन द्वारा ( Basin Method )

यह विधि नए – नए बागों तथा जहां पानी की उपलब्धि अधिक हो , अकसर प्रयोग की जाती है । सिंचाई से पूर्व 3 फुट व्यास की बेसिन वृक्ष के चारों तरफ बनाई जाती है । यह व्यास जैसे – जैसे वृक्ष बढ़ता है उसके साथ बढ़ा देना चाहिए लेकिन तना पानी के सम्बन्ध में नहीं आना चाहिए । दो वृक्ष एक नाली द्वारा जोड़ दिए जाते हैं । और इस प्रकार सभी वृक्ष नालियों द्वारा मिला दिए जाते हैं कभी – कभी एक ही लाइन में सभी वृक्ष एक – दूसरे से बेसिन नालियों से जोड़ दिए जाते हैं । इस प्रकार पानी एक बेसिन से दूसरी बेसिन में होता हुआ आखरी बेसिन में पहुंच जाता है । यह विधि बड़े वृक्षों के लिए बड़ी लाभदायक है ।

Basin Method

लाभ

  1. सभी पौधे आवश्यकतानुसार पानी ग्रहण करते हैं ।
  2. यह ढलान वाली भूमियों के लिए बहुत अच्छा है ।
  3. यह नर्म भूमियों के लिए उत्तम है ।
  4. यह अमरूद , अनार , लिची के लिए बहुत उत्तम है ।

हानियां

  1. बेसिन बनाने के लिए अधिक श्रम लगाना पड़ता है ।
  2. जड़े नीचे भूमि में गहरी चली जाती है जिससे वृक्ष अधिक ऊँचे हो जाते है जो फल-वृक्षों में हानिकारक है ।
  3. पानी तने के साथ लगता हुआ आगे बढ़ता है ।

3 . गोलाकार विधि ( Ring System )

इस विधि में वृक्ष के चारों तरफ 2-3 फुट व्यास का एक फुट ऊंचा चबूतरा बना दिया जाता है । इस चबूतरे के चारों तरफ 1.50 – 2 फुट की नाली बनाई जाती है । यह नाली सभी वृक्षों में बनाई जाती है तथा प्रमुख मुख नाली से जोड़ दी जाती है जो वृक्षों की दो लाइनों के बीच से गुज़रते है । नाली का व्यास पौधे की आयु के साथ – साथ बढ़ा दिया जाता है । यद्यपि यह सिचाई का अच्छा ढंग है तथापि पुराने वृक्षों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है ।

ring system

लाभ

  1. पानी और तने का सम्बन्ध नहीं रहता ।
  2. थोड़े पानी से अच्छी सिंचाई होती है ।
  3. भारी भूमियों के लिए उत्तम है ।
  4. आम , पपीता , लीची के लिए खासकर अच्छा है ।

4 . कूड़ विधि ( Furrow Method )

  1. भूमि की ऊपरी सतह पर पपड़ी बनती हो ।
  2. फसल की काश्त लाइनों में करनी हो ।
  3. मिर्च , बैंगन , टमाटर की फसल जो पानी से गल – सड़ जाती है और ऐसी फसलों को उगाना हो ।
  4. वह फसल जिसमें सिंचाई बहुत दिनों तक करनी हो जैसे , फूल गोभी , बन्द गोभी , अदरक , प्याज , गन्ना आदि ।

Furrow Method

उपरोक्त दशाओं में सिंचाई की कूड़ विधि बहुत उत्तम है । इस विधि में देशी हल से कूड़ निकालकर नालियां बना ली जाती हैं । नालियों की लम्बाई भूमि की ढलान और भूमि की किस्म पर निर्भर करती है ।

पानी इन कुड़ों में छोड़ दिया जाता है जिससे पूरा खेत नम हो जाता है इस विधि द्वारा थोड़े पानी से अधिक सिंचाई की जा सकती है ।

5 . बाढ़ विधि ( Open Flooding Method )

यह पानी देने का सबसे आसान तरीका है लेकिन यह वहीं प्रयोग किया जाता है जहां ( 1 ) पानी बहुत मात्रा में उपलब्ध हो । ( 2 ) फसल बहुत स्थान घेरे हो । सिंचाई करने से पूर्व खेत को समतल कर लेना चाहिए । यह विधि उन फसलों के लिए उत्तम है जिनको अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है जैसे , धान ।

Open Flooding Method

यद्यपि यह तरीका आसान है तथापि बहुत पानी नष्ट होता है । यह तरीका रेतीली भूमियों के लिए भी अच्छा नहीं । चिकनी भूमियों के लिए यह तरीका अच्छा है जिनमें पानी रोकने की क्षमता होती है ।

6 . रोक बाढ़ विधि ( Check Flooding Method )

Check Flooding Method

इस विधि में खेत को छोटी – छोटी क्यारियों से बांट दिया जाता है । जिन्हें प्लाट कहते हैं । इन प्लाटों की लम्बाई जल की उपलब्धि तथा भूमि की ढलान पर निर्भर करती है । जितना पानी का बहाव तेज़ हो उतने ही बड़े प्लाट बनाने चाहिए । यह हर प्रकार की भूमियों तथा अन्नों वाली फसलों के लिए उत्तम है ।

7 . छिड़काव विधि ( Sprinkling Method )

लाभ

  1. बहुत थोडे पानी से अधिक सिंचाई हो जाती है ।
  2. भूमि का समतल करना या खेत में किसी प्रकार की क्रियाएं नहीं की जाती इससे काफी रुपयों की बचत होती है ।
  3. भूमि की सतह से पानी नहीं उड़ पाता ।
  4. ढलान भूमि में भी भूमि कटाव का डर खत्म हो जाता है ।
  5. कीट नाशक दवाइयां तथा उर्वरक सिंचाई के साथ ही छिड़के जा सकते हैं ।

Sprinkling Method

सब्जियों और फूलों वाले पौधों को फव्वारे से सींचा जा सकता है पो फ़व्वारे से ही सिंचनी चाहिए ताकि वे टूटे नहीं । अमरीका तथा दूसरे देशों में फल – वृक्षों पर भी छिड़काव से सिंचाई की जाती है । यह वहीं इस्तेमाल की जाती है जहां पानी की बहुत कमी हो । यह सिंचाई की विधि बड़ी खर्चीली है इसलिए मूल्यवान फसलों पर ही इस विधि से सिंचाई की जाती है ।

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